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सनसेट यलो फूड कलर कर सकता है बीमार

Lucknow Updated Mon, 11 Feb 2013 05:30 AM IST
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लखनऊ। यदि आप खाने-पीने में पीली कोल्ड ड्रिंक्स, नूडल्स, मिठाइयां और आइसक्रीम जैसी चीजें ज्यादा लेते हैं तो सावधान हो जाइए। यह आपकी सेहत के लिए खतरनाक हो सकता है। आप बार-बार बीमार पड़ सकते हैं। जुकाम, बुखार, सिरदर्द और खांसी आपको परेेशान कर सकती है। यह दावा है भारतीय विष विज्ञान अनुसंधान संस्थान (आईआईटीआर) लखनऊ के एक नए शोध का। शोध के अनुसार खाद्य पदार्थों को कृत्रिम तौर पर पीला करने के लिए उपयोग होने वाला ‘सनसेट यलो’ कलर रोग प्रतिरोधक क्षमता को कम करता है।
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देश में सनसेट यलो कलर को बतौर खाद्य रंग उपयोग करने की अनुमति है। यूरोपियन फूड सेफ्टी एजेंसी (यूएफएसए) के मानकों के मुताबिक खाद्य पदार्थों की प्रकृति के अनुसार यह उपयोग प्रति किलोग्राम में 0.1 से 0.2 मिलीग्राम से अधिक नहीं होना चाहिए। लेकिन हमारे यहां ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है। आईआईटीआर की फूड टॉक्सिकोलॉजी डिवीजन द्वारा किए इस शोध में आईआईटीआर और बीएचयू के वैज्ञानिक शामिल थे। वैज्ञानिक डॉ. एके यादव और डॉ. एम दास के अनुसार मौजूदा शोध में यह जानने की कोशिश की गई कि क्या यह हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बिगाड़ सकता है। उनके मुताबिक खाद्य पदार्थों में इस रंग के अनुपात की मात्रा जांचने के लिए विशेषज्ञता की जरूरत होती है जो हर जगह उपलब्ध नहीं हो सकती। वहीं खाद्य पदार्थ तैयार करने वाले इसके उपयोग को नियंत्रित नहीं करते, ऐसे में इससे मानव शरीर को सदैव खतरा रहता है।


कहां उपयोग हो रहा सनसेट यलो
ऑरेंज सोडा, जैम, नींबू फ्लेवर की ड्रिंक्स, मिठाइयां, पैकेट सूप, कस्टर्ड पाउडर, इंस्टेंट नूडल्स, बाजार में बिकने वाला फूड कलर, आइसक्रीम, केक, स्क्वैश आदि में सनसेट यलो कलर का खूब उपयोग होता है। नारंगी और लाल शेड देने के लिए इसका उपयोग खाद्य पदार्थों में किया जाता है। इसी तरह कुछ खास चॉकलेट्स को भूरा शेड देने और कैरेमल में भी सनसेट यलो कलर का उपयोग होता है।

बच्चों को ज्यादा खतरा
दवाओं, विशेषकर बच्चों के लिए बनने वाली टेबलेट्स में सनसेट यलो रंग का बहुत उपयोग होता है। वहीं सनसेट यलो से बनने वाली अधिकतर चीजें बच्चों को काफी पसंद आती हैं। ऐसे में यह न केवल बच्चों की सेहत के लिए बड़ा खतरा है, बल्कि बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को नुकसान पहुंचा सकता है।

कई और बीमारियों का भी कारण
आईआईटीआर के वैज्ञानिकों का शोध सनसेट यलो से रोग प्रतिरोधक क्षमता पर प्रभाव पर था, लेकिन विश्व की कई संस्थाएं सनसेट यलो के कई अन्य खतरे भी बताती रही हैं। ब्रिटिश फूड सेफ्टी एजेंसी ने 2007 में दावा किया कि सनसेट यलो बच्चों मेें हाइपर एक्टिविटी जैसी समस्या बढ़ा रहा है। यूरोप की फूड स्टैंडर्ड एजेंसी ने 2005 में अपने शोध में दावा किया कि सनसेट यलो की वजह से लोगों को कैंसर हो सकता है। यूरोपियन यूनियन में सनसेट यलो को खाद्य सामग्री में उपयोग करने पर निर्माताओं को इसकी मौजूदगी की चेतावनी लिखने के निर्देश हैं। यूरोप की ही फूड सेफ्टी अथॉरिटी का पैनल 2009 में सन सेट यलो से एलर्जी, डायरिया, उल्टी, त्वचा में सूजन, सिरदर्द जैसी समस्याओं की आशंकाएं जता चुका है। इसी तरह अमेरिका में उपभोक्ता हितों को देखने वाली विज्ञान एजेंसी सेंटर फॉर साइंस इन पब्लिक इंट्रेस्ट 2010 में सनसेट यलो सहित खाने में उपयोग हो रहे तमाम रंगों को गैर जरूरी और कैंसर कारक बता चुकी है।

कई देशों में उपयोग पर रोक
नार्वे और फिनलैंड में खाद्य पदार्थों में इसका उपयोग प्रतिबंधित है। यूरोपियन यूनियन ने वर्ष 2008 में इस पर बैन लगाने का प्रस्ताव दिया था। हालांकि इसे पूरी तरह लागू नहीं किया जा सका। फिर भी इसे यूएफएसए के मानकों के मुकाबले 4 से 10 गुना तक और कम करने के निर्देश जारी किए गए थे।

आठ कृत्रिम रंगों का देश में होता है खाद्य पदार्थों में उपयोग
प्राकृतिक तौर पर मिलने वाले खाद्य पदार्थों में रंग पाए जाते हैं। वहीं कृत्रिम तौर पर भी रंग तैयार कर इनका उपयोग खाद्य पदार्थों में किया जाता है। भारत में आठ रंगों को कृत्रिम तौर पर खाद्य पदार्थों में मिलाने की अनुमति है। इनमें सनसेट यलो, टाट्राजीन, कार्मोजीन, पोन्सियू, एरिथ्रोसिन, ब्रिलियंट ब्ल्यू, इंडिगो कैरामाइन और फास्ट ग्रीन शामिल हैं। प्रिवेंशन ऑफ फूड एडल्ट्रेशन एक्ट (पीएफए) के तहत इनका रेग्युलेशन होता है और क्षेत्रीय स्तर पर स्वास्थ्य विभाग और निकाय पर इसके निरीक्षण की जिम्मेदारी है।

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