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बिना अनुशासन के नहीं हो सकती कविता

Lucknow Updated Sat, 09 Feb 2013 05:30 AM IST
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लखनऊ। काव्य रचना बिना अनुशासन के नहीं हो सकती है। कविता के लिए छंद के अनुशासन का ध्यान रखना चाहिए। यह बात वरिष्ठ गीतकार श्रीकृष्ण तिवारी ने कही। वे शुक्रवार को उप्र हिंदी संस्थान में ‘कविता लेखन कार्यशाला एवं काव्य गोष्ठी’ के समापन सत्र में बोल रहे थे। तिवारी ने गीत और मुक्तक पर विस्तार से प्रतिभागियों को बताया और निराला की सुप्रसिद्ध काव्य रचना ‘वर दे वीणा वादिनी वर दे...’ की बारीकियों से अवगत कराया। प्रसिद्ध कवि डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र ने कविता लेखन में छंद के निर्वाह की जानकारी दी। डॉ. कुंवर बेचैन ने बड़े ही सरल व सहज ढंग से छंदों के प्रकार समझाए। बेचैन ने उदाहरण के रूप में अपनी कविताओं को गाकर भी सुनाया। हालांकि संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष उदय प्रताप सिंह ने कहा कि कविता पहले लिखी जाएगी और व्याकरण बाद में आता है। उन्होंने कहा कि कविता प्रयास से आती है व्याकरण से नहीं। कविता को आनंद तक बदलना होगा तभी कविता लिखी जाती है। उन्होंने कहा कि कोई एक दिन में कवि या महापंडित नहीं बन जाता है। कार्यशाला का संचालन डॉ. अमिता दुबे ने किया। कार्यशाला के बाद यहां काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस मौके पर उपस्थित कवियों ने अपनी लोकप्रिय रचनाएं सुनाईं। डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र (देहरादून) ने ‘एक बार और जाल फेंक रे मछेरे, जाने किस मछली में बंधन की चाह हो’, श्रीकृष्ण तिवारी (वाराणसी) ने ‘गीत जिस दिन मुहब्बत के मर जाएंगे, टूटकर हम उसी दिन बिखर जाएंगे’ कविता सुनाई। उदय प्रताप सिंह ने ‘कल रात कमरे में खिड़की के रास्ते किरणों की डोर से धीरे-धीरे उतर आई चांदनी...’, डॉ. कुंवर बेचैन (गाजियाबाद) ने ‘किसी भी काम को करने को चाहें पहले आती हैं, अगर बच्चे को गोदी लो तो बाहें पहले आती हैं...’, निदेशक डॉ. सुधाकर अदीब ने ‘दुनियां के जंजाल में सधे अनेकों काम, किंतु कभी सध न पाए केवल हरि नाम...’ कविता सुनाई। इसी प्रकार आत्म प्रकाश शुक्ल (कानपुर), रामेन्द्र मोहन त्रिपाठी (आगरा), सतीश आर्य (गोंडा), अशोक टाटाम्बरी (फैजाबाद), जमुना प्रसाद उपाध्याय (फैजाबाद), डॉ. मधुरिमा सिंह (लखनऊ), रमेश रंजन (लखनऊ) ने भी अपने कविताओं से खूब वाहवाही लूटी।
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