एलडीए ने नाले की जमीन कर दी फ्री-होल्ड

Lucknow Updated Wed, 30 Jan 2013 05:30 AM IST
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लखनऊ। एलडीए में सेटिंग से कुछ भी हो सकता है। नरही में नाले की जमीन पर बन रहे कॉम्प्लेक्स के मामले में यह जुमला एक बार फिर सच साबित हुआ है। प्राधिकरण का यह खेल एक-दो नहीं बल्कि पूरे 22 साल बाद क्षेत्रीय पार्षद की शिकायत के बाद सामने आया है। नाले पर हो रहे निर्माण की नगर निगम में शिकायत करने पर पता चला कि एलडीए ने 1991 में नाले की जमीन को भी फ्री-होल्ड कर दिया था। मंगलवार को जांच करने पहुंचे निगम के इंजीनियरों ने मौके पर 100 मीटर नाले की जमीन पर कब्जा पाए जाने के बाद काम बंद करा दिया है। नरही के श्यामा चौराहे से होकर एक पुराना भूमिगत नाला (डाट नाला) गुजरता है। नाला आगे जाकर डीजीपी कार्यालय के पास हैदर कैनाल में गिरता है। तीन मीटर चौड़े इस नाले पर करीब 30 मीटर लंबाई में कब्जा कर रखा गया है। बिल्डर ने कॉम्प्लेक्स निर्माण के लिए नाले को तोड़ भी दिया है। क्षेत्रीय पार्षद अतुल यादव बंटू की शिकायत पर जांच करने पहुंचे जोन-एक के नगर अभियंता ने बताया कि नाले की जमीन को भी एलडीए ने फ्री-होल्ड कर दिया है। नाला अगर एलडीए की जमीन पर है तो भी जनहित के चलते उक्त जमीन को बेचा नहीं जा सकता। मामले की पूरी रिपोर्ट मुख्य अभियंता को भेजी जा रही है। उधर, पार्षद का कहना है कि यदि नाले की जमीन से कब्जे नहीं हटाया गया तो क्षेत्र में जलभराव की समस्या पैदा हो जाएगी। इसी नाले से आसपास के इलाके का पानी निकलता है। ऐसे में नाले से कब्जा हटाने के साथ ही जमीन बेचने वालों पर कार्रवाई की जाए।
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इस संबंध में कॉम्प्लेक्स का निर्माण कराने वाले मो. अकरम का कहना है पहले यह संपत्ति नवाब असगर की थी। उन्होंने 1991 में इसे एलडीए से फ्री-होल्ड कराने के बाद सुशील अग्रवाल व अन्य को बेच दिया था। जिनसे उन्होंने इसे खरीदा है।

नगर निगम भी संदेह के घेरे में ः इस मामले में नगर निगम के अभियंत्रण व संपत्ति विभाग की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। कारण, व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स के लिए नक्शा पास करने में नगर निगम से भी अनापत्ति जारी की गई है। इसमें कहा गया है कि नरही में जिस जमीन पर उक्त कॉम्प्लेक्स का निर्माण होना है, वहां निगम की कोई जमीन नहीं है। जबकि इसी जमीन से नाला गुजरा है। नगर निगम ने यह अनापत्ति सुशील अग्रवाल, राजीव अग्रवाल व सुशील गुप्ता द्वारा एलडीए में पेश किए गए मानचित्र पर दी है। इसके लिए नगर निगम ने वर्ष 2009 में आवेदक से करीब 70,000 रुपए मलवा शुल्क भी जमा कराया था।

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