बेगुनाह मोहर्रम को मिल गई नई जिंदगी

Lucknow Updated Fri, 14 Dec 2012 05:30 AM IST
लखनऊ। अपनी बेगुनाही साबित करने में लाचार मोहर्रम को गुरुवार को जैसे नई जिंदगी मिल गई। ढाई महीने बाद गुरुवार देर शाम उसे जेल से रिहा कर दिया गया। मोहर्रम के साथ ही आर्थिक रूप से कमजोर उसके परिजन भी रिहाई की उम्मीद छोड़ चुके थे। बूढ़ी मां शरीफुन ने बेटे को छुड़ाने के लिए विधवा पेंशन से और बकरा बेचकर कुछ हजार रुपए जुटाए। कहीं नहीं सुनी गई तो बड़ी अदालत का दरवाजा खटखटाया और कोर्ट ने मोहर्रम को उस अपराध के दाग से मुक्त कर दिया जो उसने कभी किया ही नहीं था। रिहाई के बाद जब वह सरोजनी नगर में असौमी के पास न्यू गोडौरा स्थित अपने घर पहुंचा तो परिजनों से लिपट कर खूब रोया। मोहर्रम ने बताया कि अगर वर्दी वालों ने उसकी सुनी होती तो वह 22 सितंबर को कोर्ट से जेल जाता ही नहीं। उसी दिन तीन जालसाजों ने उसे डरा-धमकाकर वांछित अपराधी राजू यादव की जगह कोर्ट में पेश कर दिया था। पुलिस की गिरफ्त में आने पर मोहर्रम बहुत चीखा-चिल्लाया। सफाई दी कि उसे तीन आदमी जबरन ले आए हैं। उसका नाम राजू नहीं मोहर्रम अली है लेकिन पुलिस वाले उसे जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा आए। न किसी वकील ने सुनी और न ही जेल में उसकी सच्ची बात पर यकीन किया गया। मोहर्रम के मुताबिक 22 सितंबर को वह साइकिल से अपनी मौसी शकील के घर डालीगंज जा रहा था। सेशन कोर्ट और लेसा के बीच वाली सड़क पर तीन लोगों ने उसे रोककर उसका नाम और पता पूछा। उसे चाय भी पिलाई। छोटे से काम के लिए कोर्ट चलने को कहा और जब उसने मना किया तो उसे धमकाया और जबर्दस्ती पकड़कर ले गए। उससे कहा गया कि जब राजू यादव का नाम पुकारा जाए तो हाथ उठा देना। मोहर्रम ने बताता कि उसे एक बड़े कमरे में खड़ा कर दिया। राजू का नाम पुकारे जाने पर काले कपड़े पहने व्यक्ति ने उसका हाथ उठाकर हाजिरी लगवाई। मोहर्रम को तब अपने हाथ उठाने का मतलब समझ आया जब पुलिसकर्मी उसे पकड़कर ले जाने लगा। इस बीच मोहर्रम को लाने वाले तीनों आदमी भाग निकले। वह चिल्लाता और गिड़गिड़ाता रहा। कोर्ट से पुलिस ने उसे जेल पहुंचा दिया जहां उसने तमाम लोगों को अपने साथ हुई घटना बताई। मां की याद में कई-कई दिन रोकर गुजारे। उसने बताया कि दो साल पहले उसकी पत्नी रेशमा दो मासूम बच्चों के साथ घर छोड़कर चली गई थी। तब से मां शरीफुन ही उसका ख्याल रखती थी। बेटे के जेल में होने की खबर मिलने पर शरीफुन भी कई बार उससे मिलने जेल गईं। भाई जिलानी व भाई परवीन के साथ परिवार के दूसरे लोग भी मोहर्रम को छुड़ाने के लिए परेशान थे। मजदूरी करने वाले परिवार के पास पैसे भी नहीं थे लेकिन शरीफुन ने हार नहीं मानी। विधवा पेंशन के रूप में बैंक खाते मेें जमा कुछ रुपए निकाले। घर में पला बकरा बेचा और इस तरह थोड़े पैसे जमाकर अदालत के दरवाजे पर पहुंची। उनकी याचिका पर हाईकोर्ट ने तुरंत संज्ञान लेते हुए सेशन कोर्ट के संबंधित एडीजे को तलब किया। सच उजागर होने पर हाईकोर्ट ने बुधवार को मोहर्रम की तत्काल रिहाई के आदेश दिए। इसके बावजूद मोहर्रम गुरुवार देर शाम तक रिहा हो पाया।

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