हक मांगने पर 8 वैज्ञानिकों को घर बैठाया

Lucknow Updated Fri, 14 Dec 2012 05:30 AM IST
लखनऊ। राजधानी के प्रमुख वैज्ञानिक संस्थानों में से एक कुर्सी रोड स्थित रिमोट सेन्सिंग एप्लीकेशन सेंटर ने अपने यहां आउटसोर्सिंग के जरिए सेवाएं दे रहे आठ वैज्ञानिकों को काम पर आने से मना कर दिया है। वहीं इनका अक्टूबर का वेतन भी रोक दिया गया है। आउटसोर्सिंग कंपनी द्वारा अपनाई जा रही वित्तीय अनियमितताओं के खिलाफ संस्थान के करीब 70 परियोजना वैज्ञानिकों और करीब इतने ही परियोजना केंद्र टेक्नीशियनों व परियोजना डीटीपी ऑपरेटरों ने अक्टूबर में विरोध-प्रदर्शन कियाथा। ये सभी एक आउट सोर्सिंग रेडिएंट इंफो सिस्टम के तहत सेंटर को सेवाएं दे रहे थे। सेंटर और कंपनी में अप्रैल 2010 में इसे लेकर करार हुआ था। अगले ढाई वर्ष कंपनी का करार आगे बढ़ाया जाता रहा। लेकिन वित्तीय नुकसान झेल रहे वैज्ञानिकों व कर्मचारियों के प्रदर्शन के बाद 31 अक्टूबर 2012 को करार खत्म किया गया। अब नई कंपनी गुजरात इंफो टेक से करार किया गया है। दूसरी ओर विरोध प्रदर्शन की अगुवाई करने वाले आठ वैज्ञानिकों को चुन-चुन कर निशाना बनाया गया है।
इन वैज्ञानिकों पर गिरी गाज ः दर्शन सिंह, आकृति सक्सेना, संदीप सिंह, ज्ञानेंद्र पांडेय, अलका श्रीवास्तव, प्रियंका गुप्ता, रंजन सिंह। कुछ वैज्ञानिकों ने बताया कि उनकी अक्टूबर महीने का वेतन रोक दिया गया है। रिमोट सेन्सिंग एप्लीकेशन सेंटर में बतौर परियोजना वैज्ञानिक काम करने वाले युवा बीएचयू, लखनऊ विवि और चित्रकूट विश्वविद्यालयों से एमएससी व रिमोट सेन्सिंग में एडवांस डिप्लोमा कर चुके हैं। एक वैज्ञानिक तो 16 वर्षों से संस्थान को सेवाएं दे रही थीं, 31 अक्टूबर की शाम काम पूरा कर घर जाने तक उन्हें कुछ नहीं कहा गया और 1 नवंबर को उन्हें गेट पर ही रोककर कह दिया गया कि उनकी सेवाएं खत्म कर दी गई हैं। बाकी वैज्ञानिक भी 2-3 साल से यहां सेवाएं दे रहे थे। इस बीच अनुभवी परियोजना वैज्ञानिकों को हटाए जाने से परियोजना प्रमुखों को भी अनुभव पा चुके वैज्ञानिकों का साथ छूटने पर दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
पीड़ितों ने लगाए आरोप ः संस्थान द्वारा 2010 में किए कॉन्ट्रैक्ट के तहत आउट सोर्सिंग एजेंसी को प्रति परियोजना वैज्ञानिक त्र14,900 वेतन पर नियुक्ति के लिए कहा गया था। इसमें करीब त्र2,200 कंपनी सर्विस टैक्स व सर्विस चार्ज के तौर पर हर महीने वेतन में से काटती रही। इसके बाद उनके वेतन से प्रोविंडेंड फंड के नाम पर त्र1,066 और प्रोफेशनल टैक्स के तौर पर त्र150 हर महीने काटे जाते रहे। इस तरह उन्हें त्र11, 484 प्रतिमाह इन हैंड मिलने चाहिए थे। लेकिन 10,700 रुपए ही इन वर्षों में दिए गए। निकाले गए वैज्ञानिकों का आरोप है कि पीएफ भी जितना बनता है उससे अधिक काटा गया, फिर बताया भी नहीं कि पीएफ नंबर क्या है। प्रोफेशनल टैक्स और कंपनी की फीस के नाम पर कटौती को भी वैज्ञानिकों ने बहुत ज्यादा बताया है।
मुझे राजनीति में नहीं पड़ना ः दूसरी ओर संस्थान के निदेशक पीएन शाह का कहना है कि पुरानी कंपनी में कार्यरत कर्मचारियों व वैज्ञानिकों की सूची नए संस्थान को दे दी गई थी, जिसमें से उन्हाेंने अपनी मर्जी से चुनाव किया। हालांकि एकाएक वैज्ञानिकों को गेट पर रोके जाने और विरोध जताने वाले वैज्ञानिकों को हटाने के मुद्दे पर उन्हाेंने संस्थान का दामन साफ बताते हुए खुद को राजनीति से दूर बताया है।

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