चीनी हमले से ज्यादा सालती है अपनों की उपेक्षा

Lucknow Updated Mon, 10 Dec 2012 05:30 AM IST
लखनऊ। सुदूर पूर्वोत्तर में बसे अरुणाचल की प्राकृतिक खूबसूरती की अक्सर चर्चा होती है। पहाड़ और खाइयों के बीच नदारद सड़कें और बुनियादी सुविधाओं का अभाव भी कभी-कभार बातों का हिस्सा बन जाता है। चीन के अरुणाचल पर दावे के बीच गर्म माहौल में जवाब सवाल के दौर भी चलते हैं, लेकिन 18 जिलों में बंटे इस प्रदेश की दुश्वारियां इन बातों, दावों और सरकारी वादों से कहीं अधिक हैं। सबसे ज्यादा दुखदायी है अपनों की उपेक्षा। अरुणाचल से आए युवा कहते हैं कि चीन के हमले से ज्यादा दर्द अपनों की शक भरी निगाहें देती हैं।
अंतरराज्यीय छात्र जीवन दर्शन (सील) अभियान के तहत पूर्वोत्तर राज्यों के 30 छात्र-छात्राओं का एक दल शनिवार से ही राजधानी में है। अभियान के अंतर्गत पूर्वोत्तर के छात्र उत्तर भारत एवं देश के अन्य हिस्सों के लोगों से मिलते-जुलते हैं और वहां के संस्कृति एवं परंपराओं को समझते हैं। रविवार को राजधानी में उन्होंने लखनवी रंगत समझने के लिए भ्रमण किया। इस दौरान हुई बातचीत में दल के सदस्यों ने अरुणाचल की दुश्वारियों के साथ ही देश के दूसरे हिस्से में उनको लेकर उठने वाले सवाल भी साझा किए।
एमए हिंदी की छात्रा पीयांग फो अरुणाचल के पूर्वी कमिंग जिले की रहने वाली हैं। फो बताती हैं कि दो साल पहले वह बंगलूरू गई थीं। अरुणाचल से बाहर निकलने का उनका पहला अनुभव था। आश्चर्य तब हुआ जब वहां लोग कहने लगे- तुम तो चीनी हो। तुम भारतीय नहीं हो। हम हतप्रभ थे। हमारा लुक, हमारी भाषा चाहे कुछ भी हो हमारा दिल हिंदुस्तानी है। हम रोज सुबह जन-गण-मन गाते हैं। भारत की जयकार करते हैं और हमारे देश में ही हम पर सवाल उठते हैं। वर्ष 2009 में प्रधानमंत्री जब अरुणाचल गए थे तो सबने उनका तहे दिल से स्वागत किया था। अरुणाचल के खिलाड़ियों ने चीन इसलिए जाने से इनकार कर दिया क्योंकि वह नत्थी वीजा दे रहे थे। चीनियों का कहना था कि अरुणाचल हमारा हिस्सा है और वहां के लोगों को वीजा की जरूरत नहीं है। खिलाड़ियों ने यह कहकर इनकार कर दिया कि हम भारतीय हैं और बिना वीजा चीन नहीं जाएंगे। बावजूद इसके, हमारी निष्ठा पर सवाल उठना ठीक नहंी है।

जिस भवन में दरवाजे-खिड़की नहीं, समझो स्कूल
अरुणाचल के उपर सबनसारी जिले के दापोरिजो कस्बे के रहने वाले बोदे बयोर कहते हैं कि हमारे यहां शिक्षा की हालत बदतर है। शहर के जिस भवन में दरवाजे-खिड़की नहीं हो समझ लो यह स्कूल है। बयोर कहते हैं कि कहने को अरुणाचल में 18 जिले हैं लेकिन सड़क, आवागमन एवं अन्य सुविधाएं इतनी बदतर हैं कि दो-चार जिलों के बारे में भी लोगों को जानकारी नहीं है। बकौल बोदे तक्सिन जिले में एक जगह है लुंगझुंग। यह चीन बॉर्डर के ठीक पास है। लुंगझुंग से तक्सिन पहुंचने में तीन दिन लगते हैं। न कोई सड़क है न संपर्क मार्ग। पहाड़ों, नदियों को पार करके आना पड़ता है। कई ऐसी जगह है जहां सेना के लिए जाना मुश्किल है। वहां कई बार स्थानीय लोग ही सेना को खाना-पीना खिलाते हैं। संसाधनों का इतना अभाव एवं आजादी के छह दशक बाद भी सरकारी उदासीनता अभी भी लोगों की देशभक्ति नहीं डिगा सकी है। आंसू भरी आंखों से बयोर कहते हैं कि जब 62 की कहानी हमारे बुजुर्ग सुनाते हैं तो उनकी आंखें भर आती हैं। पश्चिमी शियांग की रहने वी 12वीं छात्रा दग्जम इते कहती हैं कि हम पर सवाल उठाने की बजाय लोग हमारा सहयोग करें तो ज्यादा बेहतर है।

घुसपैठियों के साथ है सरकार
असम के कोकराझार जिले के नॉर्थ कालागांव के रहने वाले बिद्या बर्गयारी पीजी के छात्र हैं। मूलत: बोडो जनजाति के बिद्या पिछले दिनों कोकराझार और पूरे असम में घटी हिंसा की घटनाओं को याद करके सिहर उठते हैं। बकौल बिद्या वहां सरकार क्षेत्रीय लोगों के साथ नहीं बल्कि घुसपैठियों के साथ खड़ी है। बांग्लादेशी घुसपैठियों का बोडो विरोध करते हैं तो उन्हें ही उल्टे सुरक्षा बलों की लाठियां पड़ती हैं। यही वजह है कि अलग बोडोलैंड की मांग जोर पकड़ रही है।

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