दरवाजा खुला रखना...

Lucknow Updated Sun, 02 Dec 2012 05:30 AM IST
लखनऊ। लखनऊ महोत्सव में शनिवार को गजल गायक भूपेन्द्र- मिताली की जुगलबंदी ने एक बार फिर खूब रंग जमाया। साज के दिल में सोज पलता है, मुस्कुराहट में दर्द ढलता है, हुस्न है ऐसे चिराग की लौ, इश्क का जिसमें खून जलता है... शेर से आमद करते हुए भूपेन्द्र-मिताली ने अपनी प्रसिद्ध गजल राहों पे नजर रखना, होठों पे दुआ रखना, आ जाए कोई शायद, दरवाजा खुला रखना... से संध्या का आगाज किया। गजल गायन के क्षेत्र में जगजीत सिंह-चित्रा सिंह, भूपेन्द्र-मिताली और राजेन्द्र मेहता-नीना मेहता की जोड़िया प्रसिद्ध रही हैं। भूपेन्द्र ने फिल्मों में भी कई लोकप्रिय गीत-गजलें गायी हैं। दर्शकों से खचाखच भरे सांस्कृतिक पंडाल में भूपेंद्र-मिताली ने एक के बाद एक गजलें सुनाई। उन्होंने अहसास की शमा को, इस तरह जला रखना, अपनी भी खबर रखना, उसका भी पता रखना..., इक बूंद भी अश्कों की दामन ना भिगो पाए, गम उसकी अमानत है, पलको पे सजा रखना..., इस तरह कतील उससे, बरताव रहे अपना, वो भी ना बुरा माने, दिल का भी कहा रखना..., दिल को छूने वाले रहे। उन्होंने अपनी लोकप्रिय गजल तुम पूछो और मैं ना बताऊं, ऐेसे तो हालात नहीं, इक जरा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं... गम के अंधियारे में तुझको, अपना साथी क्यूं समझूं, तू फिर तू है मेरा तो, साया भी मेरे साथ नहीं... भी सुनाई। भूपेन्द्र ने इस मौके पर फिल्मों के अपने कई गजल और गीत भी सुनाए, जिनमें दिल ढूंढता है फिर वही फुरसत के रात दिन..., इक अकेला इस शहर में, रात हो या दोपहर में..., बीती ना बिताए रैना..., हो के मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा..., हुजूर इस कदर भी ना इतरा के चलिए..., किसी नजर को तेरा इंतजार आज भी है..., शामिल थे। बाद की गजलों में जिंदगी-जिंदगी मेरे घर आना जिंदगी..., हरेक रूह में इक गम छुपा लगे हैं मुझे... रहीं। तबला पर मुशर्रफ खान, गिटार पर अरशद और बांसुरी पर हरिमोहन श्रीवास्तव ने अच्छी संगत की।
गजलों वाली अब फिल्में नहीं रहीं ः दिल ढूंढता है..., दो दीवानें इस शहर में..., नाम गुम जाएगा...., बीती ना बिताये रैना..., किसी नजर को तेरा इंतजार आज भी है...., हुजूर इस कदर भी ना इतरा के चलिए... को फिल्मों में गाने वाले प्रसिद्ध गजल गायक भूपेन्द्र मानते हैं कि आज वैसी फिल्में ही नहीं बन रही हैं, जिसमें गजल की गुंजाइश हो। शनिवार को लखनऊ कार्यक्रम प्रस्तुत करने आए भूपेन्द्र-मिताली ने कहा कि पहले के फिल्मकारों, संगीतकारों की बात ही कुछ और थी। उमराव जान दोबारा बनी, लेकिन पहले जैसी बात नहीं आ पाई। उन्होंने कहा कि फिल्म संगीत में मौलिकता की कमी हुई है। गीतों को सुनते हुए लगता है कि पहले सुना है। हालांकि उन्होंने कहा कि शायर आज भी बहुत प्रतिभाशाली हैं और नए गजल गायक भी आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि गजलों की लोकप्रियता में कमी नहीं आई है।

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