आरामतलब जीवनशैली दे रही डायबिटीज को न्यौता

Lucknow Updated Sun, 18 Nov 2012 12:00 PM IST
लखनऊ। 35 से 40 वर्ष की दहलीज पर पहुंच रहे ऐसे लोग जो तला-भुना भोजन और फास्ट फूड ज्यादा खाते हैं। साथ ही उनकी दिनचर्या में व्यायाम भी शामिल नहीं है तो वे मधुमेह (डायबिटीज) का शिकार हो सकते हैं, लेकिन ऐसे लोगों को और अधिक सावधान होने की जरूरत है। जिनमें फास्टिंग (खाली पेट) या फिर पोस्ट पेरेंडियल (खाना खाने के बाद) ही शुगर बढ़ती है। यह जानकारी केजीएमयू के फिजियोलॉजी विभाग के प्रोफेसर और यूपी डायबिटीज एसोसिएशन के सचिव डॉ. नरसिंह वर्मा ने शनिवार को यूपी डायबिटिक एसोसिएशन के ग्यारहवें अधिवेशन में हुई कार्यशाला में दी। डॉ. नरसिंह वर्मा ने बताया कि 12 घंटे खाली पेट रहकर जब ब्लड शुगर की जांच कराई जाए और वो सामान्य स्तर 110 से ज्यादा हो, लेकिन पीपी (खाना खाने के बाद) ब्लड शुगर की जांच कराने पर वो सामान्य निकले तो मरीज को प्री-डायबिटिक कहा जाता है। डॉ. नरसिंह ने बताया कि सिर्फ पीपी या फास्टिंग में ब्लड शुगर का बढ़ा होना भी स्वास्थ्य के लिए उतना ही घातक है जितनी कि दोनों स्थिति में शुगर का बढ़ना। सिर्फ फास्टिंग में शुगर का स्तर बढ़ना इम्पेयर्ड फास्टिंग ग्लूकोज (आईएफजी) और पीपी में सुगर बढ़ना इम्पेयर्ड पोस्ट पेरेंडियल ग्लूकोज (आईपीजी) कहलाता है। इसे प्री-डायबिटिक स्टेज कहा जाता है। ये मरीज यदि जीवन शैली नहीं सुधारते हैं तो प्री-डायबिटिक से डायबिटिक में बदल जाते हैं। प्रो. नरसिंह वर्मा ने कहा कि ऐसे मरीजों को 30 फीसदी दवा से और 70 फीसदी लाइफ स्टाइल मॉडीफिकेशन (जीवनशैली में बदलाव) से ठीक किया जा सकता है। यदि शुरुआत में इस स्थिति पर नियंत्रण पा लिया जाए तो शरीर को ज्यादा नुकसान नहीं होता है।
क्या है आईएफजी ः 12 घंटे खाली पेट रहने के बाद जांच में शुगर बढ़ी मिले और खाना खाने के बाद वाली जांच में सामान्य है तो ये स्थिति इम्पेयर्ड फास्टिंग ग्लूकोज (आईएफजी) कहलाती है। इसे प्री-डायबिटिक स्टेज भी कहा जाता है। लंबे समय तक भूखा रहने पर ग्लूकोज की मात्रा 60 से 70 मिलीग्राम से नीचे हो जाती है। ऐसी स्थिति में लिवर में स्थित ग्लाइकोजेन टूट कर ग्लूकोज बनाता है। इससे ग्लूकोज का स्तर शरीर में कम न हो। आईएफजी में लिवर शुगर की मात्रा कम न होने पर भी ग्लूकोज बनाता रहता है। इससे ब्लड में शुगर की मात्रा बढ़ जाती है। ये स्थिति भविष्य में मरीज के लिए घातक होती है। इसलिए इसे शुरू में ही नियंत्रित कर लेना चाहिए।
ग्लूकोज मेमोरी की भूमिका महत्वपूर्ण ः प्रो. नरसिंह वर्मा बताते हैं कि मानव शरीर में लिगेसी इफेक्ट या ग्लूकोज मेमोरी की भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। इस स्थिति में शरीर में शुगर यदि आज बढ़ती है तो गुर्दों, नेत्र, हृदय आदि अंगों पर असर तीन से पांच सालों बाद होता है। यदि इसे शुरुआत में ही नियंत्रित कर लिया जाए तो इसका फायदा 10 साल बाद मिलता है। यदि शुरुआती 10 साल तक शुगर को नियंत्रित कर लिया जाए तो इसके बाद शुगर बढ़ने पर भी शरीर को बहुत ज्यादा नुकसान नहीं होगा।
राजधानी के 15 फीसदी लोग प्री-डायबिटिक ः राजधानी के 10 से 15 फीसदी लोग प्री-डायबिटिक हैं। यानी कि इन लोगों को भविष्य में डायबिटीज हो सकती है। ये ऐसे लोग हैं जो आरामतलब जीवनशैली जी रहे हैं। खानपान गलत है और उम्र 40 साल के आसपास है। यदि इन्होेेंने अपनी जीवनशैली नहीं सुधारी तो ये मधुमेह की गिरफ्त में होंगे। ये निष्कर्ष निकाला है लखनऊ एसोसिएशन ऑफ प्रैक्टिसिंग पैथोलॉजिस्ट एंड माइक्रोबॉयोलॉजिस्ट (एलएपीपीएम) ने। एलएपीएम के इस शोध में राजधानी की 23 पैथोलॉजी में 1200 लोगों की नि:शुल्क डायबिटीज की जांच की गई थी। एलएपीपीएम के अध्यक्ष डॉ.पी.के.गुप्ता के अनुसार प्री-डायबिटिक वो लोग होते हैं जिनकी खाली पेट ब्लड की जांच में शुगर की जांच 110 से 126 मिलीग्राम पाई गई। जबकि खाना खाने के बाद (पीपी) 140 से 180 मिलीग्राम पाई जाती है। इस स्थिति को खतरे की घंटी कहा जा सकता है और समय रहते व्यायाम, खानपान सुधार कर मधुमेह को दूर रखा जा सकता है।

खुद जाने डायबिटीज है या नहीं
जांच स्तर
खाली पेट ब्लड शुगर 70 से 110 मिलीग्राम/डेसीली.
खाने के बाद ब्लड शुगर 200 मिलीग्राम/डेसीली. से कम
ब्लड प्रेशर 130/80 मिलीग्राम/डेसीली.
एलडीएल कोलेस्ट्राल 100 मिलीग्राम/डेसीली. से कम
एचबीए1सी 7 प्रतिशत
यूरिन माइक्रोएलब्यूमिन निगेटिव

ऐसे करें नियंत्रण
खानपान सुधार कर
नियमित व्यायाम
नियमित दवा
नियमित जांच

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