घटना या चरित्र से अधिक महत्वपूर्ण है प्रभाव में प्रतिरोध का रचना

Lucknow Updated Sun, 04 Nov 2012 12:00 PM IST
लखनऊ। कथाक्रम में दो दिवसीय ‘असहमति के स्वर, लोकतंत्र और कथा साहित्य’ विषयक संगोष्ठी के शनिवार को प्रथम सत्र में एक ओर जहां यह बात उठी कि साहित्य में असहमति के स्वर दर्शाने के लिए प्रतिरोध के चरित्र और घटनाएं महत्वपूर्ण हैं वहीं यह बात भी सामने आई कि घटना या चरित्र से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि रचना पाठकों पर प्रभाव में कितना प्रतिरोध रच पाती है। वक्ताओं ने कहा कि आज लोकतंत्र लोक के लिए नहीं है, बल्कि कुछ खास लोगों के लिए है। लोकतंत्र में ऐसे स्वर जरूरी हैं जो असहमति के हों। साहित्य लोकतंत्र के असहमति के स्वरों को व्यक्त भी करता है और दबाता भी है। वरिष्ठ लेखिका मैत्रेयी पुष्पा ने कहा कि महिलाएं अपनी असहमति के स्वरों को हमेशा व्यक्त करती रही हैं, चाहे उसे सुना जाय या नहीं। लोकगीतों में उनके असहमति के ही स्वर हैं। आलोचक वीरेन्द्र यादव ने कहा कि प्रेमचंद जहां असहमति के स्वर बुलंद कर रहे थे वहीं गांधी भी राजनीति में अपनी असहमति व्यक्त कर रहे थे। वरिष्ठ साहित्यकार मुद्राराक्षस ने कहा कि लोकतंत्र आज लोक के लिए नहीं है, कुछ खास लोगों के लिए है। उन्होंने सवाल उठाया कि आज तक कोई दलित उद्योगपति क्यों नहीं हुआ। ‘तद्भव’ के संपादक तथा कथाकार अखिलेश ने विषय पर विस्तार से और नये ढंग से अपनी बात कही। उन्होंने कहा कि प्रतिरोध करता चरित्र या घटना से अधिक महत्वपूर्ण है प्रभाव में प्रतिरोध का रचना। उन्होंने कहा कि साहित्य में प्रतिरोध की मुखरता उसकी निरर्थकता भी बन सकती है। ‘गोदान’ में गोबर का प्रतिरोध अधिक मुखर है लेकिन होरी अधिक प्रभाव उत्पन्न करता है। उन्होंने कहा कि चीख, रुदन, दबी हुई सिसकी भी कई बार रचनाकार के लिए अधिक उपयोगी साबित होती है। प्रतिरोध की विभिन्न युक्तियां हो सकती हैं। अखिलेश ने कहा कि स्वतंत्रता के बाद के तीन महत्वपूर्ण साहित्यकारों श्रीलाल शुक्ल की राग दरबारी, हरिशंकर परसाई की व्यंग्य रचनाओं और रघुवीर सहाय की कविताओं में आक्रामकता या आंदोलनधर्मिता नहीं है लेकिन व्यंग्य की धार के साथ ये पाठक में प्रतिरोध का प्रभाव रचती हैं। मूलचन्द गौतम के संचालन में हुई संगोष्ठी में हिन्दी संस्थान के निदेशक सुधाकर अदीब ने कहा कि असहमति के लिए बहुत मुखर होना जरूरी नहीं। रोहिणी अग्रवाल ने कहा कि साहित्य विडंबनाओं को व्यक्त करते हुए गहराइयां रचता है। विभास वर्मा ने कहा कि वैधता को विवेक सम्मत बनाना लोकतंत्र की सबसे बड़ी समस्या है। तरुण भटनागर ने कहा कि प्रजातंत्र के विरोध में की गयी क्रांतियां बहुत सफल नहीं हुई हैं।

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