लॉ कॉलेजों से फिर शुरू हुआ सवाल-जवाब का खेल

Lucknow Updated Sun, 21 Oct 2012 12:00 PM IST
लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय से संबद्ध लॉ कॉलेजों में मानकों से खेल जारी है। विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा बनाई गई दूसरी कमेटी ने भी लॉ कॉलेजों की बदतर हालात का खुलासा किया है। आठ संबद्ध लॉ कॉलेजों में चार बिना प्राचार्य के ही चल रहे हैं और दो की मान्यता सवालों के घेरे में है। अनियमितता की यह रिपोर्ट आए पांच सप्ताह से अधिक हो चुके हैं। इसका भी हश्र पिछली रिपोर्ट जैसा ही होता नजर आ रहा है। कार्रवाई के नाम पर कॉलेजों को फिर नोटिस भेजा जा रहा है। हाईकोर्ट के आदेश एवं राजभवन के दबाव के बाद पिछले वर्ष अप्रैल में डीन लॉ प्रो. ओएन मिश्र की कमेटी ने बाबा साहब भीमराव अंबेडकर लॉ कॉलेज, लखनऊ लॉ कॉलेज, सिटी एकेडमी लॉ कॉलेज, सेंट मदर टेरेसा लॉ कॉलेज, एक्सेल लॉ कॉलेज, हीरालाल यादव लॉ कॉलेज, नर्वदेश्वर लॉ कॉलेज एवं यूनिटी लॉ कॉलेज की जांच की थी, जिसमें साफ अनियमितताएं मिली थीं। इसके बाद कॉलेजों को नोटिस देने की खानापूर्ति शुरू हुई। कॉलेजों के जो जवाब आए वे संतोषजनक नहीं थे। जब जांच कमेटी के अध्यक्ष डीन लॉ प्रो. ओएन मिश्र को कॉलेजों का जवाब भेजा गया तो उन्हाेंने व्यस्तता का हवाला देकर एक और जांच कमेटी बनाने की सलाह दे डाली। कॉलेजों ने विश्वविद्यालय द्वारा भेजे गए नोटिस का जो जवाब भेजा था उसके भौतिक परीक्षण के लिए तीन सदस्यीय कमेटी बनाई गई, जिसमें ॅविभाग के प्रो. आरआर लायल, डॉ. सीपी सिंह एवं डॉ. आरबी जैसल शामिल थे। कमेटी को सितंबर के पहले सप्ताह में रिपोर्ट देनी थी। कमेटी ने अपनी जांच रिपोर्ट में बताया कि एक्सल लॉ कॉलेज, लखनऊ लॉ कॉलेज, भीमराव अंबेडकर लॉ कॉलेज और मदर टेरेसा लॉ कॉलेज में कोई प्राचार्य नहीं है। एक्सल लॉ कॉलेज एवं मदर टेरेसा लॉ कॉलेज की मान्यता सवालों के घेरे में है जबकि किसी कॉलेज में शिक्षक-छात्र अनुपात ठीक नहीं है तो कहीं शिक्षकों की नियुक्ति के मानक पूरे नहीं हैं तो कहीं वेतन एवं अन्य सुविधाओं से शिक्षक महरूम हैं। दूसरी रिपोर्ट आए पांच सप्ताह से अधिक हो चुके हैं, लेकिन लविवि अभी कार्रवाई की दिशा तय नहीं कर सका है। इतने दिनों में लविवि बस इतना हरकत में आया कि कॉलेजों को नोटिस भेजकर अनियमितताओं पर अपना पक्ष स्पष्ट करने को कहा जा रहा है। पिछली रिपोर्ट पर नोटिस एवं जवाब का खेल एक साल से अधिक चला था और अनियमितताओं के बावजूद कॉलेज लगातार दूसरे सत्र में भी दाखिला लेने में सफल हो गए। स्थिति यह रही कि पिछले साल अप्रैल में आई पहली रिपोर्ट पर नवंबर में फैसला हो सका और इसके बाद नए सत्र तक नोटिस, जवाब और रिमाइंडर का ही दौर चलता रहा। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि लविवि में जांच कमेटी की प्रक्रिया कॉलेजों की कमियों को उजागर कर उन पर कार्रवाई करने के लिए है या जांच रिपोर्ट के नाम पर मामले को ठंडे बस्ते में पहुंचाने के लिए। फिलहाल प्रक्रिया के नाम पर चल रहे इस खेल में निर्दोष विद्यार्थी पिस रहे हैं।

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