प्लेटलेट्स बताएंगी मस्तिष्क की बीमारियां

Lucknow Updated Sun, 21 Oct 2012 12:00 PM IST
लखनऊ। मस्तिष्क की बीमारियों का पता करने के लिए बहुत ज्यादा जांचों की जरूरत नहीं पड़ेगी। डॉक्टरों ने नए-नए तरह के मस्तिष्क रोगों का पता लगाने के लिए मरीज को दवा देने के बाद प्लेटलेट्स की जांच की, इससे कई तरह की बीमारियों की जानकारी हुई। इस नई तकनीक से मरीज व डॉक्टर दोनों को राहत मिलेगी। ऐसी ही कई जानकारियां शनिवार को केजीएमयू के फार्माकोलॉजी विभाग में देश भर से एकत्र हुए डॉक्टरों ने दी। बायोटेक पार्क के निदेशक डॉ. पीके सेठ ने बताया कि जैसे रिसेप्टर ब्रेन में होते उसी तरह के प्लेटलेट्स में होते हैं। मस्तिष्क न्यूरांस की मदद से कार्य करता है। इसमें दो न्यूरांस के बीच स्पेस होता है, जिसे क्लेफ्ट कहते हैं। क्लेफ्ट की अधिकता हानिकारक साबित हो सकती है। इसे कंट्रोल करने के लिए ब्रेन की बजाय प्लेटलेट्स की जांच की गई। पांच सौ मरीजों को दवा देने के बाद प्लेटलेट्स की जांच की गई। इनमें 90 मरीजों में मस्तिष्क की बीमारियां पाई गई। अन्य मरीजों में सामान्य बीमारी ही सामने आई। इंडियन इंस्टीट्यूट आफ इंटीग्रेटेड मेडिसिन जम्मू के निदेशक डॉ. राम विश्वकर्मा ने अपना शोध प्रस्तुत करते हुए बताया कि भारतीय मसालों से कैंसर रोका जा सकता है। बिना पीसे इन मसालों का सही तरीके से इस्तेमाल स्वास्थ्य के लिए काफी फायदेमंद होता है। अधिक तलने-भुनने से मसाले नुकसानदेह साबित होते हैं। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश में 30 प्रतिशत से अधिक कैंसर के मरीज गुटखा व नशे से हो रहे हैं। स्मोकिंग व नशे का सेवन सेल में म्यूटेशन पैदा कर देते हैं। म्यूटेशन रोकने से कैंसर को नियंत्रित किया जा सकता है। गलत आयुर्वेदिक दवाओं के प्रयोग से काफी नुकसान हो सकता है। उन्होंने बताया कि कई आयुर्वेदिक दवाएं जिनके असर के बारे में अभी कुछ पता नहीं चल सका है उनकी जांच चल रही है। हमारा संस्थान कई कंपनियों की आयुर्वेदिक दवाओं पर रिसर्च कर रहा है। जल्द ही ऐसी दवाओं का खुलासा करेंगे। कार्यक्रम में विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ केके पंत समेत कई लोग मौजूद थे।

कैंसर को दूर भगाता है हल्दी का करक्यूमिन ः हल्दी का एक कंपाउंड करक्यूमिन होता है। इसे हल्दी की गांठ से अलग किया जाता है। उसके बाद इसको दवाओं के साथ मिलाते हैं। यह कैंसर को रोकने के साथ ही कैंसर को खत्म करने का प्रयास करता है। इसी तरह काली मिर्च में एक कंपाउंड पाइप्रीन होता है। इसको टीबी की दवा के साथ महज दस ग्राम मिलाया जाता है। वहीं टीबी की दवा की डोज कम कर दी जाती है। इससे महज आठ माह के भीतर टीबी को नियंत्रित किया जा सकता है। वहीं बच्चों में ब्लड कैंसर की रोकथाम के लिए एक नई दवा ग्लीबैक बनाई गई है। सरकार ने इस पर प्रयोग का अधिकार दे दिया है।

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