आज 75 के हो जाएंगे शरद नागर

Lucknow Updated Thu, 18 Oct 2012 12:00 PM IST
लखनऊ। हिंदी के विख्यात लेखक अमृतलाल नागर के कनिष्ठ पुत्र होना उनका एक परिचय जरूर है, लेकिन डॉ. शरद नागर ने संस्कृति एवं साहित्यकर्मी के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। शरद नागर 18 अक्तूबर को अपने जीवन के 75 शरद पूरे कर रहे हैं। कई पुस्तकों के लेखक शरद नागर संस्कृतिकर्मी तथा रंग अध्येता के साथ अपने पिता की साहित्यिक संपदा के संरक्षण के लिए भी जाने जाते हैं।
शरद नागर ने वैसे तो कार्बनिक रसायन विज्ञान में पीएचडी की है किंतु रसायन विज्ञान की अपेक्षा उन्होंने सांस्कृतिक उन्नयन विशेषकर रंगमंच के क्षेत्र में सक्रिय योगदान किया। हिंदी के प्रथम आधुनिक विधि से खेले गए नाटक ‘जानकी मंगल’ के प्रथम मंचन की तिथि की खोज की और उसके आधार पर तीन अप्रैल के दिन को हिंदी रंगमंच दिवस के रूप में स्थापित करने में उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान किया। इसी आधार पर तीन अप्रैल 1968 को हिंदी रंगमंच की प्रथम शताब्दी मनाई गई।
डॉ. नागर ने उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी की नौकरी में रहकर विविध क्षेत्रों में सृजनात्मक योगदान किया। वहीं 1975 में स्थापित भारतेन्दु नाट्य अकादमी में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। अकादमी से वे 1996 में सेवानिवृत्त हुए। हालांकि मस्कुलर डिस्ट्राफी के कारण विगत 16 वर्षों से उनका चलना-फिरना, घर से बाहर निकलना नहीं हो पाता, लेकिन इसे उन्होंने अपने लेखन के लिए वरदान माना है। डॉ. नागर ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के लिए नौटंकी कलाकार गिर्राज प्रसाद पर पुस्तक लिखी है। इसके अतिरिक्त उन्होंने उजास की धरोहर, फिल्म क्षेत्रे-रंगक्षेत्रे, अत्र कुशलं तत्रास्तु, 1857 की दो वीरांगनाएं, अमृतलाल नागर रचना संचयन, संपूर्ण बाल रचनाएं, अमृत मंथन का संपादन किया है। बारह खंडों में उन्होंने अमृतलाल नागर रचनावली का संपादन किया है। इन दिनों वे 16 खंडों में अमृतलाल नागर साहित्य समग्र का संपादन कर रहे हैं।

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