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गर्भवस्था में थायरइडिज्म शिशु के लिए खतरनाक

Lucknow Updated Mon, 15 Oct 2012 12:00 PM IST
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लखनऊ। गर्भवती महिलाओं को थकान व ज्यादा पसीना आए और कमजोरी महसूस हो तो उन्हें इसे गंभीरता से लेना चाहिए। यह लक्षण थाइराइडिज्म के हो सकते हैं। इस बीमारी से गर्भ में पल रहा शिशु दुनिया देखने के पहले ही विकलांग हो सकता है। केजीएमयू के सर्जरी विभाग की ओर से आयोजित आईएईएसकॉन- 2012 के अंतिम दिन सीएमएसी वेल्लूर से आए डॉ. पीवी प्रदीप ने ये जानकारी दी।
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उन्होंने बताया कि थायराइड ग्रंथि बढ़ने से शरीर में हार्मोनल बदलाव हो जाते हैं। गर्भावस्था के दौरान थायराइडिज्म बीमारी गर्भस्थ शिशु के लिए घातक साबित हो सकती है। गर्भस्थ शिशु का मानसिक व शारीरिक विकास प्रभावित होने के साथ-साथ वह सुस्ती व कब्ज का शिकार हो सकता है। इसलिए गर्भवस्था के दौरान थायराइड की जांच जरूर करानी चाहिए ताकि रोग की पहचान होने पर तत्काल इलाज हो सके। समय पर इलाज से गर्भस्थ को मानसिक विकलांगता से बचाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि इस बीमारी से पीड़ित महिलाओं की संख्या बढ़ रही है।
डॉ. प्रदीप ने कार्यशाला में रेट्रोर्स्टनल गाइटर (छाती तक फैला घेंघा) के जांच एवं उपचार की तकनीक पर भी प्रकाश डाला। इस दौरान उन्होंने महत्वपूर्ण जानकारियां दी। कार्यशाला में यूएसए के प्रो.पाल ग्रेगर, बिग्रेडियर एम गांगुली, डॉ. एचपी सिंह, एसजीपीजीआई के डॉ. अमित अग्रवाल, केजीएमयू के डॉ. एमएल भटट्, डॉ. अभिनव सोनकर और पीजीआई के डॉ. ज्ञान चंद्र ने कैंसर मरीजों में सर्जरी की तकनीकियों पर प्रकाश डाला। अंतिम दिन आयोजक डॉ. आनन्द मिश्रा एवं डॉ. संदीप तिवारी ने कार्यशाला की सफलता के लिए सभी अतिथियों को धन्यवाद दिया।
गर्भवतियों को सावधान रहने की जरूरत
केजीएमयू के इंडोक्राइन सर्जन डॉ. संदीप तिवारी ने बताया कि वजन कम होना, भूख बढ़ जाना, उच्च रक्त चाप, हृदयगति का बढ़ना, अधिक पसीना आना, मांसपेशियों में कमजोरी, शिथिलता, बार-बार डायरिया, हाथ में कंपन, अधिक मासिक रक्त स्राव, अधिक ठंड लगना व हर समय थकान महसूस होना इस बीमारी का लक्षण हो सकता है। यह लक्षण दिखने पर फ्री-टी-3 व फ्री-टी-4 परीक्षण अवश्य कराना चाहिए। उन्होंने बताया कि इस बीमारी से प्रभावित महिलाओं की संख्या काफी बढ़ रही है। लोग इस बीमारी के लक्षणों को नजरंदाज करते है और जो परेशानी होती है उसी का इलाज कराते रहते हैं। उच्च रक्त चाप है तो उसे कम करने की दवा चिकित्सक देते है। डायरिया है तो उसकी दवा देते है। इस बीमारी के प्रति जागरूकता न होने के कारण इसका प्रभाव शिशुओं पर पड़ता है। इस बीमारी से ग्रस्त गर्भवती महिलाओं को हाई रिस्क ग्रुप प्रिगनेन्सी में रखना चाहिए। इस वर्ग की गर्भवती महिलाओं में अल्फा फीटो प्रोटीन, एचसीजी, ओस्ट्रीओल व एंटी फास्फोलिपिड एंटीबॉडी परीक्षण कराना चाहिए। उन्होंने बताया कि बीमारी के कारण तो स्पष्ट नहीं हैं, लेकिन बीमारी से प्रभावित मां से जन्म लेने वाले शिशु का मानसिक स्तर कम है तो दवाओं के जरिए कुछ हद तक उपचार संभव है।
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