दस सालों में छह गुना बढ़ी पुस्तकों की बिक्री

Lucknow Updated Sun, 14 Oct 2012 12:00 PM IST
लखनऊ। चिंता और चर्चा ये कि पठनीयता घट रही है। पहले सिनेमा और टीवी ने हमारा समय चुराया और अब इंटरनेट पर व्यस्तता। ऐसे में लोग किताबों से दूर हो रहे। हिंदी में तो प्रकाशकों का रोना। किताबें इस प्रकार छापी जाती हैं जैसे लेखकों पर उपकार किया जाता हो। चार-छह सौ प्रतियां छापने की बात वे बताते हैं जिनके भी बिक न पाने का रोना रोया जाता है। गिने-चुने लेखक को ही रॉयल्टी मिल पाती है। इसके विपरीत आंकड़े और सच्चाई यह है कि प्रकाशन का धंधा फल-फूल रहा है। प्रकाशक अपने व्यवसाय का विस्तार कर रहे हैं। नए-नए प्रकाशक भी इस व्यवसाय में उतर रहे हैं। नई-नई पुस्तकें, पुस्तकों के कई संस्करण, आकर्षक आवरण, सुंदर छपाई देखने को मिल रही है। इसका सीधा सा अर्थ है कि कोई भी व्यवसाय घाटे के लिए नहीं होता है। अगर पुस्तक मेला को ही एक नजीर मान लें तो यह बताता है कि किस प्रकार यह व्यवसाय लगातार फायदे में जा रहा है। अगर लोग पुस्तकें नहीं खरीदते तो पुस्तक मेला का यह आयोजन कब का बंद हो चुका होता लेकिन इसने तो लगातार दस सफल वर्ष तय कर लिए हैं। मेला से जुड़े आंकड़े पुस्तकों के प्रति प्रेम को दर्शाते हैं और चौंकाने वाले हैं। मेले की शुरुआत 65 स्टॉल, 45 प्रकाशकों वितरकों की भागीदारी और 52 लाख की बिक्री से हुई थी। दसवें वर्ष स्टॉलों की संया 185 , प्रकाशकों वितरकों की भागीदारी सौ और नौ दिनों की बिक्री दो करोड़ 60 लाख तक पहुंच चुकी है। बिक्री के आंकड़े इस वर्ष तीन करोड़ तक पहुंच जाने की संभावना है। स्थान की कमी को देखते हुए मेले को 2009 में बलरामपुर मैदान से मोती महल लॉन लाया गया जिससे अधिक से अधिक स्टॉल लगाए जा सकें और अधिक से अधिक लोग आ सकें।

पुस्तक मेला : एक दशक का सफर
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आयोजन तिथि स्टॉल प्रकाशक-वितरक अनुमानित बिक्री
2003, 15 से 23 नवंबर 65 45 52 लाख
2004, 1 से 10 अक्तूबर 80 60 40 लाख
2005, 24 सितं से 3 अक्तू. 100 65 75 लाख
2006, एक से 10 सित. 120 70 1 करोड़
2007, 28 सितं. से 7 अक्तू. 130 75 1 करोड़ 10 लाख
2008, 19 से 28 सितंबर 135 80 1 करोड़ 25 लाख
2009, 11 से 20 सितंबर 145 90 1 करोड़ 60 लाख
2010, एक से 10 अक्तू. 150 92 1 करोड़ 90 लाख
2011, 16 से 25 सितम्बर 165 100 2 करोड़ 45 लाख
2012, पांच से 14 अक्तूबर 185 100 2 करोड़ 60 लाख (नौंवे दिन तक)

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