डायरिया भी छीन रहा बच्चों की रोशनी

Lucknow Updated Thu, 11 Oct 2012 12:00 PM IST
लखनऊ। बच्चों में दस्त और कुपोषण अंधेपन का बड़ा कारण बन रहा है। खासकर गरीब परिवारों के बच्चे इसका शिकार हो रहे हैं। यदि बच्चे को 24 घंटे में 7-8 बार दस्त हो जाए तो उसे तुरंत विटामिन ए देना जरूरी होता है, ताकि उसकी कॉर्निया को नुकसान न पहुंचे। केजीएमयू में नेत्र रोग विभाग की प्रो. पूनम किशोर ने बुधवार को विश्व दृष्टि दिवस की पूर्व संध्या पर यह जानकारी दी।
प्रो. पूनम किशोर ने बताया कि डायरिया के कारण शरीर में विटामिन ए की कमी हो जाती है। इसके कारण कॉर्निया में संक्रमण हो जाता है। इसलिए 7-8 दस्त होते ही विटामिन ए का इंजेक्शन जरूर देना चाहिए। केजीएमयू के बाल रोग विभाग में इस गाइडलाइन का ध्यान रखा जाता है, लेकिन अन्य अस्पतालों में अभी इसका ध्यान नहीं रखा जा रहा है। दस्त होने के बाद 24 घंटे के अंदर विटामिन ए का एक इंजेक्शन, 48 घंटे बाद फिर से और दो हफ्ते बाद एक बार फिर विटामिन ए देना होता है। इससे कॉर्निया में संक्रमण होने का खतरा नहीं रहता। प्रो. पूनम किशोर ने बताया कि बाल रोग विशेषज्ञों और फिजीशियन को जागरूक करना बहुत जरूरी है क्योंकि डायरिया होने पर लोग अस्पताल पहुंचते हैं, जहां बाल रोग विशेषज्ञ या फिर फिजीशियन ही उनका इलाज करते हैं। यदि समय पर विटामिन ए मिल जाए तो बच्चों के जीवन में होने वाले अंधेरे को रोका जा सकता है। इसके अलावा बच्चों की आंख उठ आने पर उसमें कीचड़ आ जाता है। माता-पिता कीचड़ को साफ नहीं करते। आंख को खोलने में डरते हैं। इससे भी कॉर्निया में संक्रमण होने का खतरा होता है। इसलिए आंख को साफ गुनगुने पानी से धीरे-धीरे साफ कर उसे खोल देना चाहिए। नेत्र चिकित्सक की सलाह पर दवा भी लेनी चाहिए।

चश्मे का नंबर जल्दी-जल्दी बदले तो रखें ध्यान : मोतियाबिंद, ग्लूकोमा, डायबिटिक रेटिनोपैथी बीमारियां अंधेपन का सबसे बड़ा कारण बन रही हैं। यदि नजर कमजोर हो रही है, चश्मे का नंबर जल्दी-जल्दी बदल रहा है तो आंख की जांच तुरंत नेत्र रोग विशेषज्ञ से कराएं। इसके अलावा मधुमेह रोगियों को भी सावधानी बरतने की जरूरत है क्योंकि डाइबिटिक रेटिनोपैथी से भी आंख की रोशनी जा सकती है। प्रो. पूनम किशोर ने बताया कि मोतियाबिंद आम तौर पर 50 वर्ष के बाद होने वाली बीमारी है, लेकिन युवाओं को भी यह बीमारी हो रही है। मोतियाबिंद के ऑपरेशन चिविवि और सभी जिला चिकित्सालयों में नि:शुल्क होते हैं। यदि किसी व्यक्ति के चश्मे का नंबर जल्दी-जल्दी बदल रहा है तो संभव है कि उसे ग्लूकोमा (संबल बाई) हो। आम तौर पर लोग इसे नजर का कमजोर होना मानते हैं, जबकि यह गंभीर बीमारी है और इसमें आंख की पुतली खराब हो जाती है। इसलिए 45 वर्ष की उम्र के बाद आंखों की जांच नेत्र रोग विशेषज्ञ से कराते रहना चाहिए।

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