पड़ोसी जिलों की फैक्ट्रियों से गोमती जहरीली!

Lucknow Updated Sun, 23 Sep 2012 12:00 PM IST
लखनऊ। पुराने लखनऊ सहित आधे शहर में शुक्रवार शाम से मटमैला पानी सप्लाई हो रहा है। ये स्थिति रविवार तक जारी रह सकती है। दरअसल, जलकल विभाग ने गोमती नदी से सप्लाई किए जाने वाले पानी में क्लोरीन की मात्रा बढ़ा दी है और पानी को पीने लायक बनाने के लिए एल्मिना नामक दवा भी मिलाई है। इस तरह शोधन की लंबी प्रक्रिया के बाद पानी पीने लायक तो बन गया पर उसका रंग अब भी लाल या मटमैला ही बना हुआ है। बताया जाता है कि पड़ोसी जिलों सीतापुर और लखीमपुर की फैक्ट्रियों ने गोमती नदी के पानी को जहरीला कर दिया है। हर बार की तरह इस बार भी फैक्ट्रियों ने बारिश की आड़ लेकर बिना शोधित किए ही रासायनिक अपशिष्ट गोेमती में बहा दिया। इससे गोमती का पानी भूरे और लाल रंग का दिख रहा है। इसकी जानकारी के बाद जलकल विभाग के महाप्रबंधक गऊघाट पहुंचे और उनकी मौजूदगी में विभाग की टीम ने पानी की जांच की। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सचिव को भी इसकी सूचना दे दी गई है। बोर्ड पानी की जांच कर नदी में रासायनिक अपशिष्ट छोड़ने वाली फैक्ट्रियों के खिलाफ कार्रवाई कर सकता है। महापौर डॉ. दिनेश शर्मा ने जलकल विभाग को दिन में तीन बार पानी की जांच करने का निर्देश दिया है।
डीएम-कमिश्नर को भेजेंगे रिपोर्ट ः गोमती में पड़ोसी जिलों की फैक्ट्रियों द्वारा रासायनिक अपशिष्ट छोड़े जाने की रिपोर्ट जलकल विभाग जिलाधिकारी व मंडलायुक्त को भी भेजेगा। इसके निर्देश भी महापौर ने विभाग को दिए हैं। महापौर ने कहा कि रासायनिक अपशिष्ट छोड़ने के संबंध में सीतापुर और लखीमपुर के डीएम से भी पत्राचार किया गया, लेकिन फैक्ट्रियों की मनमानी नहीं रुक रही है।
मछलियों पर भी संकट ः दो महीने पहले रासायनिक अपशिष्ट छोड़ेने से जिस तरह गोमती में मछलियां मरी थीं, वैसी ही स्थिति इस बार फिर बनने की आशंका है। जानकारों का कहना है कि रासायनिक अपशिष्ट से जलीय मछलियों पर संकट है। अपशिष्ट से पानी में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है।
...पर सोता रहा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ः गोमती एक बार फिर अधिकारियों की लापरवाही से दूषित हो गई। सीतापुर व लखीमपुर जिलों में स्थित कुछ फैक्ट्रियों के प्रदूषित कचरे से शनिवार को गोमा का पानी भूरे रंग का दिखने लगा। इसके बाद भी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी देर रात तक उदासीन बने रहे। जिले के प्रभारी रीजनल अधिकारी एसके मिश्रा का मोबाइल दोपहर बाद से लगातार स्विच ऑफ मिला। वहीं, बोर्ड के चेयरमैन वसीम अहमद खां व सदस्य जेएस यादव भी देर रात तक गोमती में घुले प्रदूषित कचरे को लेकर अंजान दिखे। दोनों ही जिम्मेदारों ने शहर से बाहर होने की बात कहते हुए जिम्मेदार लोगों की शिथिलता पर गहरी नाराजगी जताई।
12 घंटे बाद हुई कार्रवाई ः जलसंस्थान प्रशासन ने सुबह ही गऊघाट में गोमती के पानी का रंग बदलने के बाद इसके प्रदूषण युक्त होने की आशंका जताते हुए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के प्रभारी रीजनल अधिकारी को जानकारी दे दी थी। इसके बाद भी बारह घंटे तक नदी के पानी के नमूने जांच के लिए लेने की जहमत बोर्ड से जुड़े किसी भी अधिकारी ने उठाना उचित नहीं समझा।
फटकार के बाद रात नौ बजे सैंपलिंग ः बोर्ड अध्यक्ष की फटकार के बाद रात नौ बजे नींद से जागे अधिकारी प्रदूषित पानी का नमूने लेने के लिए गऊघाट पंपिंग स्टेशन सहित गोमती बैराज पहुंचे और पानी के नमूने भरने की कार्रवाई में जुटे। बोर्ड से जुड़े अधिकारी स्वामीनाथ ने देर रात बताया कि जांच टीम ने गोमती नदी के पानी के तीन नमूने प्रयोगशाला भेजे हैं। रिपोर्ट आने के बाद पानी में प्रदूषण के स्तर व इसकी मात्रा के बारे में जानकारी मिलेगी। इसके आधार पर ही पानी को प्रदूषणमुक्त करने की कार्रवाई होगी।
पैसा बचाने को फेंका जाता कचरा ः बोर्ड से जुड़े जानकार बताते हैं कि बरसात के दिनों में हर साल सीतापुर व लखीमपुर इलाके में संचालित चीनी मिलें व कुछ अन्य फैक्ट्रियां परिसर में बड़े-बड़े टैंकों में स्टोर किया प्रदूषित कचरा गोमती में बहाती है। इसकी रोकथाम की सीधी जिम्मेदारी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के संबंधित रीजनल अधिकारी की होती है। व्यवस्था के तहत इसके लिए बरसात से पहले हर फैक्ट्री परिसर का निरीक्षण कर स्टोर कर रखे गए हानिकारक कचरे को ढूंढ़ कर नष्ट कराना होता है। फैक्ट्री संचालक ऐसे कचरे को नष्ट करने में आने वाली ऊंची लागत के कारण इसे बरसात में पानी बढ़ने पर गोमती में फेंकवा देते हैं।

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