बंद बाजारों में दिखा विरोध का दम

Lucknow Updated Fri, 21 Sep 2012 12:00 PM IST
लखनऊ। राजधानी बृहस्पतिवार को बंद करवाई गई, लेकिन जिंदगी चलती रही। बीमारों का अस्पताल पहुंचना जरूरी था, मुसाफिरों का चलना भी। रोजाना सड़क पर भागने-दौड़ने वाली जिंदगी को भी रोकने की कोशिश की गई, लेकिन इससे आम लोगों के लिए परेशानियां ही हुईं। किसी को ट्रेन छूटने की टेंशन रहीं तो कोई जख्मी पैर लिए धूप में पैदल चलने को मजबूर हुआ।। पिज्जा न मिलने से लेकर सामान ढोने जैसी तमाम परेशानियों से राजधानीवासी दो-चार हुए। इन्हीं परेशानियों और बंद के आदेश के बावजूद चलती रही जिंदगी को कवर किया ‘अमर उजाला’ ने।
6 किमी चले पैदल ः बंद के बावजूद स्कूल खुले थे। एलपीएस गोमतीनगर में पढ़ने वाले आनंद और आकाश काफी देर पत्रकारपुरम चौराहे पर खड़े रहे। पूछने पर आनंद ने बताया कि रोज पब्लिक ट्रांसपोर्ट से स्कूल आते-जाते हैं, लेकिन बंद की वजह से फंस गए हैं। घर एमिटी के पास है, कोई साधन नहीं होने से 6 किमी पैदल चलकर पत्रकारपुरम पहुंचे। उम्मीद थी कि यहां कोई न कोई साधन मिल जाएगा, लेकिन कोई ऑटो-रिक्शा भी इतनी दूर जाने को तैयार नहीं हो रहा है, लगता है पैदल ही जाना होगा।
सफर हुआ मुश्किल ः रिश्तेदारों के पास जा रहे भरत भूषण परिवार के साथ सीतापुर रोड पर बस के लिए काफी देर इंतजार करते रहे। सामान लिए धूप में खड़े रहने पर बंद के औचित्य पर सवाल उठाते हुए कहा कि समझ नहीं आता जनविरोधी नीतियां बनाने वाली सरकारें हमें ज्यादा परेशान कर रही हैं या उनका विरोध करने वाले। भरत भूषण के अनुसार बंद कराने का कोई फायदा तो नजर नहीं आता, उल्टा पूरे दिन लोगों को तकलीफ उठानी पड़ती है। परिवार ने काफी देर इंतजार के बाद आखिरकार एक ऑटो बुक कर बस स्टैंड के लिए रवाना हुए।
बोझ उठाए, चले स्टेशन को ः अपने साथियों के साथ गोरखपुर से आए मोमिन अंसारी ने बताया कि बंद की वजह से उन्हें सामान को ढोते हुए स्टेशन जाना पड़ रहा है। मोमिन के अनुसार कोई ऑटो चारबाग स्टेशन जाने को तैयार नहीं हो रहा है। सामान काफी है, ऐसे में साथियों ने बोझ बांट लिया है। लेकिन सवारी के लिए साधन कहां से मिलेगा, नहीं जानते। ऐसे में जब तक संभव है, सामान उठाकर चल रहे हैं। साथ ही बंद कराने वालों के प्रति कोई सहानुभूति उनके मन में नहीं है।
ऑटो वाले नहीं उठाना चाहते खतरा ः बंद की वजह से एक ओर लोगों को यातायात के साधन नहीं मिल रहे थे तो कुछ ऑटो वालों ने इसका जमकर फायदा उठाया। हालांकि ज्यादातर ऑटो नहीं चले। कपूरथला पर ऑटो चालक हरीशचंद्र और संजय ने बताया कि एक दिन के लिए बंद कराने वालों से खतरा मोल नहीं ले सकते। गोमती नगर की सवारियों को तो ले जाया जा सकता है, लेकिन हजरतगंज, कैसरबाग और चारबाग जैसी जगहों पर जाना खतरे में खाली नहीं है। शाकिर, शैलेष, विजय और सूरज ने ऑटो न चलाने का ही तय किया।
खाने-पीने से रहे महरूम ःबंद के माहौल में जहां एक ओर बाकी शहर रोजमर्रा के नियत कार्यों को पूरा करने की जद्दोजहद में लगा था, बहुत से लोगों, विशेषकर युवाओं को मॉल, मूवीज और फास्ट फूड जैसी लग्जरी से महरूम रहना पड़ा। शालीमार शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में पिज्जा लेने आए शिवम वर्मा ने बताया बंद की वजह से लोगों को जो परेशानी होती है उसके बारे में भी सोचा जाना चाहिए।
परेशान हुई डायलिसिस पेशेंट ममता ः ममता तिवारी को सप्ताह में दो दफा डायलिसिस के लिए विवेकानंद पॉलीक्लीनिक आना होता है। दुर्भाग्य से बंदी के दिन उन्हें अस्पताल आना पड़ा। पति प्रमोद उन्हें किसी तरह सहारा देकर अस्पताल ले आए, लेकिन लौटते समय धूप की वजह से ममता की हालत बिगड़ने लगी। पैदल चलना मुश्किल हो रहा, अस्पताल से आधा किमी दूर तक जाने पर उन्हें ऑटो रिक्शा मिला। प्रमोद ने बताया कि बंद की वजह से कोई ऑटो चारबाग होते हुए आने को तैयार नहीं हो रहा था, बड़ी मुश्किल से अस्पताल पहुंच सके थे।
कंधे का सहारा लेकर पहुंचे अस्पताल ः बंद के दिन जरूरी काम से निकले करुणा शंकर एक सड़क हादसे में चोटिल हो गए। आईटी चौराहा स्थित चिकित्सालय में किसी तरह अपने रिश्तेदारों का सहारा लेकर पहुंचे। इलाज कराने के बाद चिंता घर जाने को लेकर थी। प्रदर्शनकारियों द्वारा ऑटो रिक्शा तोड़े जाने की खबर के चलते आईटी चौराहे से चारबाग के लिए कोई ऑटो नहीं मिला, ऐसे में साथियों ने कंधे का सहारा दिया और दर्द सहते हुए किसी तरह पैदल ही गए।
बना रहा ट्रेन छूटने का डर ः बाराबंकी से आए अनवर अली अपनी बेटी और पत्नी के साथ कैसरबाग बस अड्डे पर काफी देर अटक गए। उन्हें मुरादाबाद जाना था। अनवर ने बताया कि सूचना तो थी कि बंद रहेगा, लेकिन इस तरह फंसने का अंदेशा नहीं था। काफी देर बाद एक साइकिल रिक्शा उन्हें चारबाग रेलवे स्टेशन ले जाने के लिए तैयार हुआ। भीड़-भाड़ के बीच अनवर अली जैसे-तैसे परिवार के साथ स्टेशन रवाना हुए। हालांकि उन्हें उम्मीद कम थी कि समय से पहुंचकर ट्रेन पकड़ सकेंगे।
क्या कमाएंगे, कैसे खाएंगे ः एक ओर जहां कुछ क्षेत्रों ऑटो और रिक्शा चालक बंद में फायदा उठा रहे थे, वहीं तमाम रिक्शा चालक ऐसे भी थे जिनके लिए रोटी का इंतजाम भी मुश्किल हो गया। परिवर्तन चौक पर खड़े रिक्शा चालक मुन्ना राम ने बताया कि यूं तो दोपहर 3 बजे तक 150 रुपये के आसपास कमा लेते हैं, लेकिन बंद के चलते 30 रुपये ही कमा सके हैं। पूछने पर कि बंद से किसे फायदा होगा, कहा कि सिर्फ नेताओं को, जनता का तो नुकसान ही नुकसान है।
दबे-छिपे खुली खाने-पीने की दुकानें ः बंद की तमाम गतिविधियों के केंद्र रहे हजरतगंज चौराहे पर कुछ मिठाई वालों ने दबे-छिपे दुकानें खोली। इसका फायदा खाने-पीने की चीजें तलाश रहे लोगों को मिला। एक दुकान पर आए लखनऊ यूनिवर्सिटी स्टूडेंट विजय अग्रवाल और विवेक त्रिपाठी ने बताया कि कुछ ही दुकानें खुली हैं। ऐसे में बाहर खाने वालों को मुश्किल हो रही है। वहीं कुछ मिठाई वालों ने आधे शटर खोलकर सामन बेंचा।

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