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व्यावसायिक आलोचना तो विद्यालयों में पढ़ने-पढ़ाने के लिए

Lucknow Updated Fri, 31 Aug 2012 12:00 PM IST
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लखनऊ। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान में गुरुवार को आयोजित साहित्यकार स्मृति सभा में विचार व्यक्त करते हुए प्रसिद्ध आलोचक प्रो. नामवर सिंह ने आलोचना को दो भागों में बांट दिया। उन्होंने कहा कि व्यावसायिक आलोचना तो विद्यालयों में पढ़ने पढ़ाने के लिए होती है लेकिन वास्तविक आलोचना वह है जो रचना की तरह लिखी जाए। आलोचक भी रचनाकार की तरह ही श्रम करते हैं। ये अलग बात है कि कृति को भुलाकर हवाई आलोचनाएं लिखने की प्रवृत्ति भी बढ़ती जा रही है। यशपाल सभागार में गुरुवर हजारी प्रसाद द्विवेदी को याद करते हुए प्रो. सिंह ने कहा कि उन्होंने सूर पर लिखा, कबीर पर लिखा लेकिन तुलसी पर लिखने की उनकी इच्छा अधूरी रह गयी। वास्तव में वाराणसी में जो तुलसी की स्थिति हुई वही हजारी प्रसाद द्विवेदी की भी थी। अगर वे तुलसीदास पर लिखते तो वह उनकी आत्मकथा ही होती। उन्होंने कहा कि लोकजीवन में जो सम्मान तुलसी का है वह किसी और का नहीं है। लेखिका कुसुम वार्ष्णेय ने भगवती चरण वर्मा पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि परिस्थितियों ने भगवती बाबू को नियतिवादी बना दिया था लेकिन उनका नियतिवाद निष्क्रिय होना नहीं है, बल्कि यह नियतिवाद गीता का कर्मयोग है। आरंभ में संस्थान के निदेशक सुधाकर अदीब ने स्वागत किया। संचालन सुषमा गुप्ता ने तथा धन्यवाद ज्ञापन अमिता दुबे ने किया।
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साहित्यकार निदर्शनी का शुभारम्भ ः उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा तैयार साहित्यकार निदर्शनी का शुभारंभ गुरुवार को प्रो. नामवर सिंह ने किया। संस्थान की वेबसाइट पर यह निदर्शनी उपलब्ध रहेगी जिसमें जिलेवार रचनाकारों का परिचय दिया गया है। संस्थान के निदेशक सुधाकर अदीब ने बताया कि जल्द ही इसे पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित करने का प्रयास किया जाएगा।

यशपाल को क्यों भूल गए ः समारोह में प्रो. नामवर सिंह ने सवाल उठाया कि नागर जी और भगवती बाबू को तो संस्थान याद कर रहा है लेकिन यशपाल को क्यों भूल गया है जबकि ये साहित्यकार लखनऊ की साहित्यकार त्रिमूर्ति हैं। उन्होंने कहा कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का लखनऊ से बहुत संबंध नहीं था सिवाय इसके कि वे हिन्दी ग्रन्थ अकादमी के कार्यकारी उपाध्यक्ष थे। धन्यवाद ज्ञापन करते समय संस्थान की सहायक संपादक अमिता दुबे ने बताया कि नागर जी, भगवती बाबू और हजारी प्रसाद द्विवेदी की जयंती अगस्त माह में होती है इसलिए संस्थान उन्हें एक साथ याद कर रहा है। यशपाल को उनकी जयन्ती पर दिसम्बर माह में याद किया जाता है।

‘चित्रलेखा’ में गूंजे गीत ः भगवती चरण वर्मा की जयंती के अवसर पर उनके महानगर स्थित आवास ‘चित्रलेखा’ में भी समारोह का आयोजन किया गया। इस मौके पर उनकी कविताओं की प्रस्तुति हुई और उनके कृतित्व की चर्चा की गयी। शांभवी और वासवी ने जहां उनकी लिखी ‘मातृवंदना’ सुनायी तो वरालिका और वृक्षर ने ‘वर्मा जी ने खाए आम’ सुनाया। शिवानी श्रीवास्तव ने उनका लिखा लोकगीत ‘मेरे नैना’ सुनाया। इस मौके पर प्रसिद्ध व्यंग्यकार गोपाल चतुर्वेदी सहित मदन मोहन सिन्हा, विद्या बिन्दु सिंह, कुसुम वार्ष्णेय, शान्तिदेव बाला, देवकीनंदन शान्त ने भगवती बाबू के कृतित्व की चर्चा करते हुए उनके बहुआयामी साहित्य का उल्लेख किया। वक्ताओं ने कहा कि कविता, कहानी, उपन्यास के अतिरिक्त उन्होंने फिल्म, टेलीविजन के लिए लिखा, नाटक, आलोचना लिखी। शायद ही कोई साहित्यकार होगा जिसने इतनी विधाओं में लिखा होगा।

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