‘अंजुमन’ में झलका चिकन कारीगरों का दर्द

Lucknow Updated Sun, 26 Aug 2012 12:00 PM IST
सामाजिक फासलों पर चर्चा के लिए आयोजित दो दिवसीय फिल्म समारोह फासले शनिवार को राय उमा नाथ बली प्रेक्षागृह में शुरू हुआ। पहले दिन प्रसिद्ध फिल्मकार मुजफ्फर अली और आनन्द पटवर्धन की फिल्में दिखायीं गयीं। आनन्द पटवर्धन की उपस्थिति में जब उनका वृत्तचित्र ‘जय भीम कामरेड’ दिखाया जा रहा था तो सभागार खचाखच भरा हुआ था। पटवर्धन ने बाद में दर्शकों के साथ संवाद भी किया।
फिल्म समारोह का उद्घाटन सायरा परवीन ने किया जो कि सनतकदा के साथी साझा मंच की वीडियो यूनिट की सदस्य हैं। सनतकदा की नसरीन खान ने संस्था के इस दूसरे फिल्म समारोह पर विस्तार से चर्चा की। अपने बीच के फासलों को मिटाने और करीब आने की प्रक्रिया के प्रतीक स्वरूप पटल पर लगे विभिन्न रंगो के दुपट्टों को रिबन की सहायता से एक दूसरे से बांधने में काफी संख्या में दर्शकों ने भाग लिया। टीवी चैनल की राधिका बोर्डिया ने बताया कि सामाजिक बदलाव की विचारधारा पर आयोजित किया जाने वाला अपने ढंग का पहला फिल्म समारोह है। इसमें कुछ ऐसी फिल्में दिखाई जा रही हैं जो आम तौर पर प्रदर्र्िशत नहीं हुई है जैसे ‘अंजुमन’, ‘जय भीम कामरेड’। इसके अलावा इन दो दिनों मे कुछ ऐसी फिल्में भी दिखाई जाएंगी जो सनतकदा के साथी साझा मंच की वीडियो यूनिट की लड़कियों ने बनाई हैं। शनिवार को इस प्रक्रिया मे दर्शको को ‘छू लो आसमां’ एव ‘जिंदगी की रोशनी’ नामक वृत्तचित्र दिखाई गई। समारोह के पहले दिन मुज़फ्फर अली की ‘गमन’ एवं ‘अंजुमन’ के साथ ‘जय भीम कामरेड’ दिखायी गयी। टीसीएस के क्षेत्रीय प्रमुख जयंत कृष्णा ने बताया कि कि ‘गमन’ मुज़फ्फर अली द्वारा निर्देशित पहली फिल्म है जिसको दो राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था। फिल्म के बाद हुई चर्चा में कहा कि आज के हालात में भी ये फिल्म उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी आज से 35 साल पहले थीे। इतने साल गुजरने के बावजूद आज भी वही हालात है, वही गरीबी है जो फिल्म में गुलाम हुसैन को मुंबई जाने और वहीं रहकर काम करने पर मजबूर करती है। आनंद पटवर्धन द्वारा निर्मित ‘जय भीम कामरेड’ महाराष्ट्र के दलित आंदोलन के पिछले 14 साल के इतिहास को बयान करती है। उसी प्रकार ‘अंजुमन’ लखनऊ के चिकन के कारीगरो की जिंदगी और उनके शोषण को दिखाती है।
‘जय भीम कामरेड’ के बाद हुई चर्चा में प्रमुख आलोचक वीरेन्द्र यादव ने कहा कि वृत्तचित्र देखकर पता चलता है कि मार्क्सवाद ने दलित प्रश्न को उस तरह से ग्रहण नहीं किया जिस प्रकार किया जाना चाहिए। यह उसके आत्मालोचन का मुद्दा है। रंगकर्मी राकेश का कहना था कि जब हम किसी चीज को सायास कैद कर रहे हैं तो हम इसे डाक्यूमेेंटेशन कैसे कह सकते हैं। संस्कृतिकर्मी अजय सिंह ने वृत्तचित्र की अवधि को लेकर आपत्ति जताई और कहा कि यह काफी लम्बी हो गयी है। सवालों के जवाब में आनन्द पटवर्धन ने कहा कि मैं सवाल उठाता हूं लेकिन जातिभेद का समाधान शायद तब हो सकता है जब कम से कम दस पीढ़ियों तक अंतरजातीय विवाह हों। उन्होंने कहा कि आम जनता और नेताओं के बीच लम्बी खाई है। ज्यादातर नेता बिक चुके हैं।

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