अध्यादेश में दम तोड़ रही डीलिट की तमन्ना

Lucknow Updated Sat, 25 Aug 2012 12:00 PM IST
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लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय में पिछले कई वर्षों से डीलिट में दाखिले बंद हैं। क्योंकि इसके अध्यादेश में परिवर्तन करके इसे नया स्वरूप देना है। फिलहाल नए अध्यादेश बनाने में हो रही लेटलतीफी बहुत से अभ्यर्थियों के डीलिट करने की तमन्ना पर ग्रहण लगा रही है। हालांकि अध्यादेश का प्रस्तावित स्वरूप भी डीलिट का सपना देख रहे कई लोगों की उम्मीद तोड़ सकता है। विवि प्रशासन डीलिट में प्रवेश के नियमों में व्यापक बदलाव कर रहा है, जिसके चलते इसमें प्रवेश की राह और भी मुश्किल हो जाएगी। प्रस्तावित अध्यादेश में पीएचडी के बाद गैप की समय सीमा से लेकर शोधपत्र तक के कई नई शर्तें जोड़े जाने की बात कही गई है। जानकारी के अनुसार पूर्व कुलपति प्रो. एएस बरार के समय लविवि में शोध अध्यादेश एवं डीलिट के नियमों की समीक्षा करके उसे और तार्किक बनाए जाने की प्रक्रिया प्रारंभ की गई थी। लंबे विचार-विमर्श और प्रक्रिया के बाद आखिरकार पीएचडी ऑर्डिनेंस पर तो मुहर लग गई, लेकिन डीलिट ऑर्डिनेंस को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका। सूत्रों के अनुसार डीलिट (डॉक्टर ऑफ लिट्रेचर), डीएससी (डॉक्टर ऑफ साइंस) एवं एलएलडी (डॉक्टर ऑफ लॉ) में प्रवेश के लिए अब पीएचडी के बाद कम से कम 10 वर्ष का गैप होना जरूरी होगा। पहले यह अंतर पांच वर्ष का था। सबसे महत्वपूर्ण जो परिवर्तन किया जा रहा है वह शोध पत्रों की संख्या का है। पहले इन पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए शोधपत्र की कोई बाध्यता नहीं थी, लेकिन विवि अब इसमें 10 शोधपत्र की शर्त जोड़ रहा है, यानी डॉक्टरेट के लिए प्रमुख राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय जर्नल में शोधकर्ता के कार्यक्षेत्र से संबंधित 10 शोध पत्रों का प्रकाशन अनिवार्य होगा। इसके बाद ही वह आवेदन कर सकेगा। डीलिट में प्रवेश के बाद डिग्री मिलने के बीच भी पांच शोध पत्रों का प्रकाशन प्रमुख राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय जर्नल में होने चाहिए। प्रस्ताव यह भी है कि थीसिस सबमिशन के बोर्ड ऑफ स्टडीज छह परीक्षकों के एक पैनल की संस्तुति करेगी, जिसके सदस्य विश्वविद्यालय से बाहर के होंगे। इसमें चार परीक्षकों की नियुक्ति स्वयं कुलपति करेंगे। लविवि के प्रवक्ता प्रो. राजेश मिश्र कहते हैं कि डीलिट के नियमों में कुछ बदलाव किए जा रहे हैं। इसमें प्रवेश एवं शोध के नियमों को यूजीसी के मानकों के अनुरूप बनाए जाने की कोशिश की जा रही है। फिलहाल अभी प्रस्ताव प्रारंभिक स्तर पर हैं। अध्यादेश को अंतिम रूप देने के बाद ही प्रवेश प्रक्रिया शुरू की जा सकेगी।

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