बर्मा युद्ध के पेंशनर की विधवा को भी पेंशन नसीब नहीं

Lucknow Updated Sat, 25 Aug 2012 12:00 PM IST
लखनऊ। ब्रिटिश राज में अंग्रेजों की ओर से बर्मा (अब म्यांमार) में युद्ध लड़ चुके भारतीय सेना के सिपाही जलेश्वर पांडेय की विधवा सुभागा देवी उर्फ रामरती पेंशन के लिए भटक रही है। 20 अगस्त 2001 को पति की मृत्यु के बाद से सुभागा देवी बेटे के साथ जिला सैनिक कल्याण बोर्ड व जिले के अधिकारियों के चक्कर लगाकर टूट चुकी है। मार्च 2003 में उन्हें सिर्फ एक बार 1300 रुपये पेंशन के रूप में मिले थे, इसके बाद एक बार भी पेंशन नहीं आई। शुक्रवार को 11वीं गोरखा राइफल्स रेजिमेंट सेंटर के पुनीत दत्त ऑडीटोरियम में आयोजित रक्षा पेंशन अदालत के दूसरे दिन उन्होंने रक्षा लेखा अधिकारियों से अपना दर्द बयां किया। वे बेटे युधिष्ठिर पांडेय के साथ आखिरी बार बस्ती से इसी आस में आईं हैं कि यहां उन्हें न्याय मिल सकेगा। युधिष्ठिर पेंशन के समस्त दस्तावेज भी लाया है, लेकिन ग्यारह साल बाद भी उन्हें पूर्व सैनिक विधवा पेंशन का लाभ नहीं मिल सका है। बस्ती निवासी सुभागा देवी के पुत्र युधिष्ठिर ने बताया कि मध्य कमान में रक्षा पेंशन अदालत की खबर पढ़कर एक बार फिर आस बंधी कि शायद यहां जाकर मां को पेंशन मिल जाए। इसी सिलसिले में बृहस्पतिवार को शिकायत दर्ज करवाकर पेंशन के सारे दस्तावेज जमा करवा दिए। अधिकारियों ने एक महीने में कार्रवाई की बात कही है। वहीं, झुकी कमर व डंडा टेक कर चलने वाले अस्सी वर्षीय चंद्रेश सिंह पेंशन संबंधी दो शिकायतों के निस्तारण के लिए बेटे के साथ पहुंचे। वे बंगाल इंजीनियर एंड सेंटर से नायक सूबेदार के पद से 31 मार्च 1975 में सेवानिवृत्त हुए थे। पिछले साल जीवित होने के प्रमाण देने के बाद भी एक साल से उन्हें पेंशन नहीं मिल पाई है। वहीं, उन्होंने वर्तमान में सिपाही से भी कम पेंशन मिलने की भी शिकायत दर्ज करवाई। इसी तरह बिहार रेजिमेंट से वर्ष 1992 में रिटायर जयराम झा व सिगनल कोर से सेवानिवृत्त राम सिंह ने कम पेंशन मिलने की शिकायत दर्ज करवाई। इसके अलावा हाथरस से आए आर्टीलरी से रिटायर्ड मानसिंह, हवलदार मातादीन मिश्र व नायक लईक अहमद ने कई सालों से आसक्तता पेंशन न मिलने की शिकायत दर्ज करवाई। ये सभी भारतीय सेना से 10 से 15 साल पहले रिटायर हो चुके हैं।

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