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कीमती जमीन हथियाने के लिये जिंदा को बनाया मृतक

Lucknow Updated Fri, 24 Aug 2012 12:00 PM IST
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लखनऊ। किसी को घर में मौजूद होने के बावजूद मृत घोषित कर दिया गया तो किसी की मृत्यु विदेश में होना बताया गया। इतना ही नहीं परिवार के साथ रह रहे व्यक्ति के तीन साल पहले मरने का प्रमाण पत्र भी तैयार कर दिया गया। ऐसे कारनामे शहर के नवविकसित इलाके में कीमती जमीनों को राजस्व अभिलेखों में फर्जी तरीके से दूसरों के नाम दर्ज कराने के लिये किये जा रहे हैं। ऐसे दो मामलों का खुलासा पिछले दिनों जमीनों की लिखा पढ़ी से पहले जांच में हुआ। इसके बाद वरासत के लंबित आवेदनों की जांच हो रही है। सरोजनीनगर क्षेत्र के अमौसी में वहां के रहने वाले विश्राम (60) की जमीन फर्जी तरीके से उन्हीं की पत्नी के नाम कराने का तानाबाना बनाया गया। तहसील सूत्रों के मुताबिक पिछले माह विश्राम की पत्नी प्रेमा देवी की तरफ से कृषि भूमि के वरासत के लिये आवेदन आया। बताया गया कि विश्राम की वर्ष 2009 में मृत्यु हो चुकी है। इसलिए दो अलग-अलग स्थानों पर स्थित विश्राम की जमीन पत्नी प्रेमा के नाम दर्ज (वरासत) कर दी जाए। आवेदन के साथ विश्राम की मृत्यु का 24 मार्च 2009 को नगर निगम से जारी प्रमाण पत्र की प्रति साक्ष्य के रूप में लगाई गई। नियम के मुताबिक वरासत की कार्रवाई करने के लिये संबंधित लेखपाल से रिपोर्ट मांगी गई। क्षेत्रीय लेखपाल जांच करने गांव पहुंचा तो भौचक्का रह गया क्योंकि वह जिस विश्राम की मृत्यु की पुष्टि करने गया था वह जिंदा मिला।
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पत्नी को पता नहीं, उसकी फोटो लगा आवेदन हो गया ः जांच में एक और खुलासा हुआ कि अनपढ़ प्रेमावती ने पति की जमीन अपने नाम करने संबंधी कोई आवेदन ही नहीं किया था। लेकिन उसकी औपचारिकता के लिये तैयार किये गये कागज पर प्रेमावती की असली फोटो लगी थी और उसे ग्राम विभाग के स्थानीय अधिकारी की तरफ से सत्यापित भी किया गया था। यह खुलासा होने के बाद वरासत की कार्रवाई को रोक दिया गया। लेकिन अब तक यह पता नहीं चल पाया कि यह जालसाजी किसने की? इसकी पड़ताल के लिये तहसील प्रशासन जालसाजी की एफआईआर दर्ज कराने की तैयारी कर रहा है। दूसरा मामला भी सरोजनीनगर इलाके का है जिसमें राकेश को कथित तौर पर मृत बताते हुये उनकी जमीन बेटे ने अपने नाम करने का आवेदन किया। राकेश की मृत्यु वर्ष 2003 में दुबई में होना बताया गया लेकिन जांच में उसका कोई प्रमाण नहीं मिला। लेखपाल की रिपोर्ट के मुताबिक गांव वालों ने यह तो स्पष्ट किया कि राकेश काम के सिलसिले में बाहर गया है लेकिन उसकी मृत्यु होने की पुष्टि नहीं की। जांच में मामला संदिग्ध पाए जाने के बाद वरासत की कार्रवाई रोक दी गई। लेखपाल की तरफ से तहसीलदार की कोर्ट में गत 16 अगस्त को केस फाइल किया गया है।

भू-माफिया कर रहे ऐसे खेल ः तहसील सूत्रों का मानना है कि शहर से लगे इलाकों में जमीनों का फर्जी तरीके से वरासतनामा कराने का खेल भू-माफिया कर रहे हैं। वह ऐसे व्यक्तियों की जमीनें चुनते हैं जो कम पढ़े लिखे व सीधे-साधे हों ताकि खुलासा होने पर भी वह अपनी संपत्ति बचाने की लंबी कानूनी लड़ाई न लड़ सकें। ऐसे व्यक्तियों को मृत घोषित कर जमीन उन्हीं के वारिस या फर्जी वारिस के नाम दर्ज करा देते हैं। इसके बाद राजस्व कर्मियों की मिलीभगत से अभिलेख में अपने आदमी का नाम चढ़वाकर जमीन बेच दी जाती है। वरासत के वक्त ऐसे मामले पकड़ में न आयें तो जमींदार को वर्षों तक पता ही नहीं चल पाता।

वर्षों से चल रहा है यह खेल ः लाखों-करोड़ों रुपये कीमत की दूसरों की जमीनें फर्जी तरीके से हड़पने का खेल काफी पुराना है। कुछ माह पूर्व आलमनगर के वर्षों पुराने कब्रिस्तान की करीब तीन बीघा जमीन ऐसे दो व्यक्तियों के दर्ज होने का खुलासा हुआ जिनका उससे कोई मतलब नहीं था। जांच में खुलासा होने पर जमीन को पुन: कब्रिस्तान के नाम दर्ज करने की कार्रवाई चल रही है। लेकिन लाखों रुपए की जमीन के फर्जी जमींदार बनाने में शामिल राजस्व कर्मियों का पता नहीं चल पाया। सुल्तानपुर रोड पर अहिमामऊ के नजदीक स्थित एक व्यक्ति की करोड़ों रुपये कीमत की जमीन फर्जी तरीके से बेचने के मामले की जांच चल रही है। मोहान रोड पर सरोसा-भरोसा गांव के पास स्थित कई बीघा सरकारी जमीन की भू-माफियाओं ने प्लाटिंग करके रजिस्ट्री तक करा डाली। ऐसे दस मामलों की अलग-अलग स्तरों से जांच चल रही है।

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