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एमफिल एंथ्रोपोलॉजी पर भी गहराया संकट

Lucknow Updated Thu, 23 Aug 2012 12:00 PM IST
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लखनऊ। यूं तो विश्वविद्यालय के जिम्मेदार हमेशा इस बात की दुहाई देते हैं कि विश्वविद्यालयों का मुख्य कार्य शोध है, लेकिन लखनऊ विश्वविद्यालय से शोधार्थियों की दूरी जारी है। पहले पीएचडी में आवेदन करने केबाद भी काफी जेआरएफ अभ्यर्थियों ने दाखिले नहीं लिए तो अब एमफिल में भी आवेदनों की हालत खस्ता ही है। ऐसे में इस बार भी कम आवेदन के चलते कुछ पाठ्यक्रमों पर बंद होने की गाज गिर सकती है। एमफिल एंथ्रोपोलॉजी में इस बार एक भी आवेदन नहीं आए हैं। ऐसे में इस कोर्स का इस बार भी बंद होना तय है। लविवि में प्राचीन इतिहास, एंथ्रोपोलॉजी, इंग्लिश, पब्लिक एडमिनिस्ट्रिेशन, संस्कृत, सोशल वर्क, सोशियोलॉजी, पॉलीटिकल साइंस एवं हिंदी में एमफिल के पाठ्यक्रम संचालित हैं। नौ विषयों को मिलाकर एमफिल की 300 सीटें हैं। लविवि में पहले एमफिल में दाखिले मेरिट के माध्यम से होते थे। यूजीसी के दिशानिर्देशों को देखते हुए लविवि प्रशासन ने सत्र 2011-12 से एमफिल में प्रवेश परीक्षा के आधार पर प्रवेश लेना शुरू किया है। पिछले सत्र में भी एमफिल एंथ्रोपालॉजी में एक भी आवेदन नहीं आया था, इसलिए यह पाठ्यक्रम प्रवेश परीक्षा के पहले ही स्थगित हो गया था इस बार भी इस पाठ्यक्रम की यही कहानी दोहराती नजर आ रही है। पिछले सत्र में एमफिल हिंदी को छोड़कर किसी भी पाठ्यक्रम की सीट नहीं भरी थी। इसके पीछे एक बड़ी वजह एमफिल पाठ्यक्रम के शुल्क में दोगुने से अधिक बढ़ोत्तरी भी थी। फिलहाल एमफिल की प्रवेश परीक्षा 26 अगस्त को 12 से 1.30 बजे तक लविवि के मुख्य परिसर में होगी।
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फीस दोगुनी, फायदा कुछ नहीं: लखनऊ विश्वविद्यालय में एमफिल पाठ्यक्रमों में आवेदनों की घटती संख्या के पीछे एक बड़ी वजह विवि प्रशासन की नीतियां भी हैं। लविवि एमफिल के लिए मोटी फीस तो वसूलता है, लेकिन एमफिल डिग्री धारी अभ्यर्थियों को वेटेज कहीं नहीं मिलता है। यहां तक कि पीएचडी में भी उन्हें सामान्य अभ्यर्थियों की तरह ही प्रवेश से प्री-पीएचडी कोर्स वर्क तक की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसके उलट जवाहर नेहरू विश्वविद्यालय आदि केंद्रीय विश्वविद्यालयों में एमफिल अभ्यर्थियों को ही पीएचडी में पंजीकृत किया जाता है। पिछले सत्र में लविवि में एमफिल-पीएचडी के संयुक्त पाठ्यक्रम शुरू किए जाने की कवायद शुरू की गई थी। विश्वविद्यालय के कुछ विभागों से यह प्रस्ताव आया कि चूंकि एमफिल में अभ्यर्थी कोर्स वर्क करता है और एक तरह से यह प्री-पीएचडी पाठ्यक्रम ही होता है। ऐसे में एमफिल एवं पीएचडी का संयुक्त कोर्स तैयार करने की संभावना तलाशी जाए। इससे अभ्यर्थी को छह महीने के कोर्स वर्क की जगह एक साल पढ़ाई करनी होगी और उसका शोध नहीं भी पूरा होता तो भी उसे कम से कम एमफिल की डिग्री मिल जाएगी। लेकिन एक बार फिर कवायद जुबानी चर्चा से आगे नहीं बढ़ पाई। लविवि प्रवक्ता प्रो. राजेश मिश्र का कहना है कि इसे लेकर पहल शुरू की गई थी। दो बैठकें भी इस संदर्भ में हो चुकी हैं। अब भी कुछ बिन्दुओं पर चर्चा बाकी है।

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