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आखिर क्या है नेट न्यूट्रैलिटी और क्यों है यह जरूरी, विस्तार से समझें

टेक डेस्क, अमर उजाला Updated Thu, 12 Jul 2018 11:57 AM IST
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दूरसंचार विभाग ने बुधवार को नेट निरपेक्षता (नेट न्यूट्रैलिटी) को हरी झंडी प्रदान कर दी। दूरसंचार नियामक ट्राई ने इसके पक्ष में सिफारिशें की थी और कहा था कि इंटरनेट सेवा प्रदाताओं को नेट निरपेक्षता के मुख्य सिद्धांत यानि इंटरनेट के एक खुले मंच पर कायम रहना चाहिए और किसी तरह के पक्षपात वाले करार नहीं होने चाहिए। सरकार के इस फैसले से इंटरनेट की आजादी बनी रहेगी। नेट न्यूट्रैलिटी के मंजूर होने के बाद इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियां अपने नेटवर्क पर हर ट्रैफिक को एक समान तवज्जो देंगी। अब सवाल यह है कि आखिर नेट न्यूट्रैलिटी क्या है और अगर इसका प्रस्ताव मंजूर नहीं होता तो आपकी जिन्दगी पर क्या असर पड़ता। आइए जानते हैं।
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क्या है नेट न्यूट्रैलिटी?
आपको बता दें कि नेट न्यूट्रैलिटी इंटरनेट की आजादी का वह सिद्धांत है जिसके तहत माना जाता है कि इंटरनेट सर्विस प्रदान करने वाली कंपनियां इंटरनेट पर हर तरह के डाटा को एक जैसा दर्जा देंगी और एक ही कीमत लेंगी। अगर नेट न्यूट्रैलिटी की सिफारिशों को मंजूर नहीं किया जाता तो इंटरनेट सेवा देने वाली और टेलीकॉम कंपनियां अपने ग्राहकों से अलग से इंटरनेट सेवा के लिए अलग-अलग कीमतें वसूलतीं। उदाहरण के लिए अगर आप यूट्यूब देखने के लिए अलग से डाटा पैक और किसी वेबसाइट पर विजिट करने के लिए अलग से प्लान। यह ठीक वैसा ही है जैसे कारों से उनके मॉडल या ब्रांड के आधार पर पेट्रोल की अलग-अलग कीमतें या अलग रेट पर रोड टैक्स नहीं वसूले जाते हैं।

टेलीकॉम और इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियां क्या चाहती थीं?
दरअसल टेलीकॉम कंपनियां चाहतीं थी कि नेट न्यूट्रैलिटी की सिफारिशें नामंजूर हो जाएं, क्योंकि इसमें उनका सीधे तौर पर फायदा है और ग्राहकों को नुकसान है। टेलीकॉम कंपनियां इसलिए भी परेशान हैं, क्योंकि धीरे-धीरे उनका सामने कई सारे मुश्किलें आ रही हैं। जैसे- एसएमएस सेवा के लिए टेलीकॉम कंपनियां अलग से पैसे लेती थीं, लेकिन व्हाट्सऐप जैसे ऐप ने एसएमएस की छुट्टी ही कर दी। ऐसे में टेलीकॉम कंपनियों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

नेट न्यूट्रैलिटी नामंजूर होता तो क्या होता?
अब सवाल यह है कि इससे आपको क्या फायदे हैं और अगर यह सिफारिश नामंजूर हो जाता तो आपको क्या नुकसान होते। तो फिलहाल आपको फायदे-ही-फायेदे हैं, क्योंकि अगर यह सिफारिश नामंजूर हो जाता तो टेलीकॉम कंपनियां आपसे अलग-अलग सेवा के लिए अलग-अलग पैसे लेतीं और कुछ सेवाओं को ब्लॉक भी कर देतीं। इसके अलावा वे इंटरनेट की स्पीड को कम भी कर सकतीं थीं। उदाहरण से समझने की कोशिश करें तो टेलीकॉम या इंटरनेट कंपनियां फेसबुक ऐप पर डाटा की स्पीड को कम करके और फिर स्पीड बढ़ाने के लिए ज्यादा पैसे की मांग कर सकती थीं।
 

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