गायब हो जाएंगे नुक्कड़ों से फिल्मी बैनर-पोस्टर?

waseem ansari Updated Wed, 22 Jan 2014 11:39 AM IST
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क्या आने वाले समय में गायब हो जाएंगे सड़कों और नुक्कड़ों से बैनर, इश्तेहार? क्या टीवी और अखबार पर विज्ञापन देना बंद कर देंगी कंपनियां? इनका जवाब हमें आने वाले वर्षों में मिलेगा लेकिन आइए जानते हैं कौन ले सकता है इनकी जगह।

स्मार्टफोन्स की आश्चर्यजनक रूप से बढ़ती लोकप्रियता के साथ एक और बाज़ार तेज़ी से फैल रहा है। वह है मोबाइल एडवर्टाइज़िंग का, यानी विज्ञापनों की दुनिया का।

अक्सर मोबाइल पर खबरें पढ़ते हुए या कोई नया ऐप शुरु करते वक्त ये विज्ञापन अचानक स्क्रीन पर आ धमकते हैं। कोई बैनर हमें डिस्काउंट पर संगीत डाउनलोड करने को कहता है, तो कोई चमचमाती नई स्क्रीन अविश्वसनीय दामों पर डिज़ाइनर सूट या घड़ियां बेचने का दावा करती हैं।

अधिकतर बार तो कोई नया गेम खेलने का ‘लिंक’ ही बेवजह तंग करने लगता है, है न?

हममें से अधिकतर लोग इससे झुंझलाते हैं, लेकिन जूतों से ले कर हवाई जहाज के टिकटों तक को बेचने का यह नया तरीका एक व्यापक धंधा बनता जा रहा है।

विज्ञापन के लिए आसान माध्यम है मोबाइल

विज्ञापनदाताओं और प्रचारकों के लिये मोबाइल इतना आसान और लोकप्रिय माध्यम क्यों बन गया है?

ज़रा इन आंकडों पर गौर कीजिए - रिसर्च कंपनी कॉमस्कोर के अनुसार भारत के 16 करोड़ इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों मे आधे से ज़्यादा मोबाइल पर इंटरनेट का प्रयोग करते हैं।

ऑनलाइन रिटेलिंग पूरे ज़ोर पर है – पांच में से तीन भारतीय, जो इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं, किसी न किसी ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट पर जाते हैं। इसका एक बड़ा कारण घर बैठे या सफर करते हुए, मनचाही चीज़ें खरीद पाने की सुविधा है।

ज़ाहिर है कि आने वाले समय में तमाम कम्पनियां और प्रचारक मोबाइल को अपना नया घर बनायेंगी और इसकी शुरूआत भी हो चुकी है।

मोबाइल विज्ञापन का बढ़ रहा है बजट
इंटरनेट मार्केटिंग विशेषज्ञों के अनुसार ज़्यादातर कम्पनियां अपने प्रचार-प्रसार बजट का 7 से 8 प्रतिशत (यानी उनके रेवेन्यू का 1 से 2 प्रतिशत) डिजिटल विज्ञापनों में खर्च करती हैं।

डी।जी।एम। इंडिया इंटरनेट मार्केटिंग कम्पनी के प्रबंध निदेशक अनुराग गुप्ता के अनुसार अगले तीन सालों में यह आंकड़ा बढ़कर 10 से 12 फ़ीसदी तक पहुंच जाएगा।

कॉमस्कोर के आंकड़ों के साथ जोड़कर इस बात को देखें, तो मोबाइल पर एड्वर्टाइज़िंग की रकम खासी बड़ी है।

ओ।एम।मीडिया के प्रमुख कपिल गुप्ता कहते हैं कि उनके अधिकतर क्लाएंट अपने मोबाइल विज्ञापनों पर होने वाले व्यय को सालाना 50 से 100 प्रतिशत तक बढ़ाते जा रहे हैं।

कपिल गुप्ता कहते हैं, “डिजिटल एडवर्टाइज़िंग का सबसे बडा आकर्षण यह है कि आप इन विज्ञापनों से “इंटरैक्ट” कर सकते हैं, यानी प्रतिक्रिया दे सकते हैं। पुराने प्रचार माध्यम – जैसे टी।वी। – के विज्ञापन धीरे-धीरे उबाऊ होते जा रहे हैं।”
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ऐप्स और मोबाइल वेबासाइटों पर बैनर के रूप में विज्ञापन चलाए जाते हैं।

कैसे काम करता है ये मॉडल ?

विज्ञापनों से कमाई का एक तरीका यह है कि ऐप बनाने वाली कम्पनी और मोबाइल नेटवर्क कम्पनी के बीच उस ऐप से मिलने वाले मुनाफे को बांटने का समझौता हो जाता है।

कुछ ऐप कम्पनियों के अपने रेट कार्ड होते हैं (कुछ उसी तरह जैसे अखबारों मे विज्ञापन देने के लिये दरें तय होती हैं) जिसके अनुसार नेटवर्क कम्पनियां वो ऐप खरीदतीं हैं।

एक और तरह का मॉडल रॉकस्टैण्ड डिजिटल प्राइवेट लिमिटेड (एक कम्पनी जो ई-बुक्स बेचती है) के मार्केटिंग मैनेजर संदीप कुमार बताते हैं, “अपने ऐप्स बेचने की होड़ में लगी कम्पनियां ऐप्स तो मुफ्त में देती हैं, लेकिन एक छोटी ‘स्पेस’ (आपकी स्क्रीन के नीचे या ऊपर चमकने वाले बैनर) विज्ञापनों को बेच देती हैं। इस धंधे में कमाये जाने वाले पैसे का एक हिस्सा “पेमेंट पोर्टल”, जैसे कि पे-यू, के हिस्से भी जाता है। हालांकि रौक्स्टैंड जैसी कम्पनियों को अपने उत्पाद सीधे प्रकाशकों से खरीदने पड़ते हैं।

आने वाले वर्षों में जब 3जी और फिर 4जी नेटवर्क पूरे देश में फैल जायेंगे और सस्ते हो रहे स्मार्ट्फोन और कनेक्शन दरें भारत की आबादी के एक बडे हिस्से के हाथ में मोबाइल इन्टरनेट पहुंचा देंगी, तब विज्ञापनों की दुनिया कैसी होगी?

भारत का उद्योग संगठन फिक्की और रिसर्च कंपनी के।पी।एम।जी की एक रिपोर्ट कहती है कि डिजिटल एडवर्टाइज़िंग का बाज़ार प्रतिवर्ष 32 फ़ीसदी की दर से बढ कर 2017 में 87 अरब रुपयों तक पहुंच जाएगा।

अभी यह एक फंतासी लग सकती है, लेकिन ज़रा सोचिये कि क्या कभी वो दिन भी आ सकता है कि शहरों से विशाल बिलबोर्ड गायब हो जायेंगे, हमारी दीवारों से पोस्टर साफ हो जायेंगे और घूम-घूम कर पर्चे बांटने वाले नवयुवक अपनी खुद की मोबाइल एडवर्टाइज़िंग कम्पनियां चलाएंगे?

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