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भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के सवालों के जवाब नहीं देते फेसबुक कर्मचारी, नियमों की आड़ में करते हैं देरी

अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 03 Sep 2020 06:57 PM IST
सार

दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच की साइबर सेल के एक शीर्ष अधिकारी के मुताबिक सोशल मीडिया पर होने वाले अपराधों के मामले में जांच एजेंसी के हाथ बहुत सीमित होते हैं। एजेंसी केवल उन्हीं मामलों की जांच सफलतापूर्वक कर पाती है, जिन मामलों में इंटरनेट सेवा और उपकरण भारतीय या प्रमाणित कंपनियों के होते हैं...

Cyber Bullying against Women
Cyber Bullying against Women - फोटो : For Refernce Only

विस्तार

फेसबुक की कार्यप्रणाली इस समय पूरी दुनिया में सवालों के घेरे में है। उस पर राजनीतिक पक्षपात के भी आरोप लग रहे हैं। वहीं सुरक्षा एजेंसियों  कहना है कि फेसबुक से जुड़े हेट क्राइम या साइबर अपराध से संबंधित गंभीर शिकायतें आने पर जब वे जानकारी मांगते हैं तो उन्हें इसका उचित जवाब नहीं दिया जाता है। कई मामलों में उनसे म्युचुअल लीगल असिस्टेंट ट्रीटी (MLAT) के अंतर्गत सूचना मांगने की जरूरत बताई जाती है। इस प्रक्रिया में गृह मंत्रालय के जरिये सूचना मांगी जा सकती है। ऐसे में संवेदनशील मामलों में अपराधियों के बच निकलने का मौका बढ़ जाता है।

पुलिस भी होती है असहाय

दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच की साइबर सेल के एक शीर्ष अधिकारी के मुताबिक सोशल मीडिया पर होने वाले अपराधों के मामले में जांच एजेंसी के हाथ बहुत सीमित होते हैं। एजेंसी केवल उन्हीं मामलों की जांच सफलतापूर्वक कर पाती है, जिन मामलों में इंटरनेट सेवा और उपकरण भारतीय या प्रमाणित कंपनियों के होते हैं। लेकिन जैसे ही ये अपराध वीपीएन सर्वर के जरिए किए जाते हैं, उनमें जांच करना लगभग नामुमकिन होता है।

अधिकारी के मुताबिक जांच एजेंसियों को सहयोग के मामले में गूगल सबसे ज्यादा सहयोगात्मक रवैया अपनाता है। इसके बाद फेसबुक और ट्विटर भी सहयोग करते हैं। लेकिन कई बार यह अधूरी और अपर्याप्त होती है। अगर इन कंपनियों के भारत में भी एक कार्यकारी कार्यालय खोले जाएं तो संवेदनशील मामलों की तहकीकात में सटीकता लाई जा सकती है। इस संदर्भ में केंद्र सरकार को विचार करना चाहिए।

अधिकारी के मुताबिक तकनीकी जांच के मामले में रोज नए तरीके विकसित होते हैं। अपराधियों के पास नवीनतम तकनीकी होती है, जबकि जांच अधिकारियों की ट्रेनिंग इसके हिसाब से नहीं होती, जिसके कारण अपराधियों तक पहुंच पाना आसान काम नहीं होता। यही कारण है कि साइबर अपराध के मामलों में दोषी करार देने की दर अभी भी बहुत कम है।

अल्गोरिद्म में बदलाव के आरोप

दरअसल, भारत में फेसबुक बहुत लोकप्रिय है। वर्तमान में 24 करोड़ से ज्यादा लोग इसका इस्तेमाल करते हैं। अनुमान है कि 2023 तक भारत में फेसबुक के उपयोगकर्ताओं की संख्या 44 करोड़ से भी ज्यादा पहुंच सकती है। लेकिन आरोप है कि फेसबुक एक पक्षीय तरीके से अपने अल्गोरिद्म में बदलाव करता है। हालांकि, फेसबुक ने इससे हमेशा इनकार किया है।

पिछले अमेरिकी चुनावों में ट्विटर पर वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए काम करने का आरोप लगा था। फेसबुक की अधिकारी अंखी दास के पत्र के लीक हो जाने के बाद आरोप लग रहा है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में फेसबुक ने भी इसी तरह भाजपा के पक्ष में काम करके मतदाताओं को प्रभावित करने का काम किया।

क्या कहता है कानून

साइबर एक्सपर्ट पवन दुग्गल कहते हैं कि कोई भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म अगर अपनी अल्गोरिद्म इस प्रकार सेट करता है कि इससे एक विचारधारा की बात लोगों तक ज्यादा पहुंचती है और किसी अन्य विचारधारा की बात लोगों तक कम पहुंचती है, तो यह भारतीय आईटी एक्ट की धारा 66 और 43(i) के अंतर्गत अपराध की श्रेणी में आता है। इसके लिए तीन साल तक की जेल, पांच लाख तक जुर्माना या दोनों सजाएं हो सकती हैं।

एक्ट की धारा-79 सोशल मीडिया प्रोवाइडर से यह उम्मीद करती है कि वे देश के नियमों-कानूनों के मुताबिक कामकाज करेंगे। अपनी नीतियों में कोई ऐसा बदलाव नहीं करेंगे जो किसी एक विचारधारा को लाभ या नुकसान पहुंचाती हो।

अमेरिका में राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया को रेगुलेट करने के लिए नए कानून बनाने की इजाजत दे चुके हैं। भारत में अभी ऐसे कानून मौजूद नहीं हैं जो इस तरह के अपराधों को रोकने के लिए बेहतर तरीके से काम कर सकें। इसके लिए भी कानून में बदलाव की मांग की जा रही है। ऐसे कानून बनने से इस तरह की घटनाओं को कम करने में मदद मिल सकती है।

हालांकि, इसी बीच फेसबुक अपने स्तर पर अपने उपयोगकर्ताओं को यह संदेश देने में लगी है कि अगर उनकी पोस्ट्स से फेसबुक को किसी कानूनी अड़चन का सामना करना पड़ता है, तो वह ऐसे पोस्ट को ब्लॉक कर सकती है या उनकी पहुंच सीमित कर सकती है।

लाभ कमाना प्राथमिकता

एप इन्वेंटिव टेक्नॉलॉजीज के सीईओ सौरभ सिंह ने अमर उजाला को बताया कि फेसबुक या ट्विटर जैसे किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए रेवेन्यू सबसे महत्त्वपूर्ण कारक होता है। कोई भी एप सिर्फ एक विचारधारा को ज्यादा प्रमोट कर दूसरी विचारधारा के लोगों के बीच खुद को अलोकप्रिय बनाने की रणनीति कभी नहीं अपनाती है।

ऐसी स्थिति में उसे एक विचारधारा के फॉलोअर खोने का डर रहता है। जैसे ही ये एप किसी एक विचारधारा के बीच अलोकप्रिय होेने लगता है, वह दूसरी विचारधारा के पोस्ट्स को ज्यादा बढ़ाकर एक संतुलन बनाने का काम करता है।

जहां तक किसी एप के द्वारा आपत्तिजनक सामग्री रोकने की बात है, तो इस पर पूरी तरह 'ब्लैंकेट बैन' नहीं लगाया जा सकता क्योंकि इससे अन्य बेहद जरूरी पेजों के भी खतरे में पड़ने की संभावना बन जाती है। किसी कंपनी के द्वारा इस मामले में अधिकतम अश्लील-हिंसक फोटो, वीडियो पर ही रोक लगाई जा सकती है। किसी भी कैटेगरी में 100 फीसदी प्रतिबंध लगाना लगभग नामुमकिन है।

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