पांचों ज्ञानेन्द्रियों से हम जो कुछ समझते हैं, उसे ज्ञान कहते हैं

प्रस्तुति- साधु निसर्ग दत्त Updated Sat, 09 Jun 2018 10:19 AM IST
knowledge obtained with the help of indriyas is called gyan
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विज्ञान एक ऐसा तरीका या विधि है, जिस पर भरोसा किया जा सकता है। तर्क और तथ्य पर जो तरीका आधार बना, वह परंपराओं की प्रतिक्रिया के रूप में आया, लेकिन ऐसा था नहीं। लोग इस नतीजे पर पहुंचे कि ऐसी किसी भी चीज का अस्तित्व नहीं हो सकता, जो तार्किक तौर पर सही नहीं हो। तर्क के प्रति इस समर्पण के चक्कर में हमने जिंदगी के आनंद को खो दिया। इससे एक ऐसा समाज विकसित हुआ, जो अधीनस्थ को मानता है और उपहार की अपेक्षा करता है।
पूर्वी देशों में भी ऐसी ही सोच रही है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हमारा आधार वैज्ञानिक नहीं है। बहुत कुछ इस बात पर निर्भर है कि हम बुद्धि चाहते हैं-तेज या मंद? जाहिर है, तेज ही चाहेंगे। बुद्धि के जरिए चीजों और प्रवृत्तियों को अच्छी तरह समझा जा सकता है। योग विज्ञान में इंसान की प्रज्ञा के चमत्कारों को अच्छी तरह समझाया गया है।

अगर प्रज्ञा या मेधा पर भरोसा नहीं करेंगे, तो सब ऐसे ही चलता रहेगा। इंसान की प्रज्ञा के और भी कई पहलू हैं। अलग-अलग खंडों में विभाजित है। अगर दूसरे पहलुओं पर भी ध्यान दिया जाए, तो वैज्ञानिक कहीं ज्यादा उपयुक्त चीजें बना पाएंगे। यह समझना होगा कि वास्तव में देखना किसे कहते हैं? अभी हम या कोई भी व्यक्ति ऐसी स्थिति में नहीं है कि सही में अपने आपको देख सके। अपने आसपास तो देख सकते हैं, लेकिन अपनी आखों की पुतली को अंदर की तरफ घुमाकर अपने भीतर की छानबीन नहीं कर सकते।

हाथ पर कोई चींटी भी चले तो आपको उसका अहसास हो जाता है, लेकिन शरीर के भीतर जो खून दौड़ रहा है, उसे महसूस नहीं कर सकते, क्योंकि आपकी ज्ञानेन्द्रियों का रुख बाहर की ओर है। जीवन गुजारने की क्षमता कुदरती रूप से आती है, लेकिन कुछ जानना चाहें तो उसके लिए कोशिश करनी ही होगी। इसे बताने का एक तरीका है, जिसे बोलचाल की भाषा में विज्ञान कहते हैं। विज्ञान का अर्थ है विशेष ज्ञान। पांचों ज्ञानेन्द्रियों से हम जो कुछ समझते हैं, उसे ज्ञान कहते हैं। जो समझ नहीं पाते, फिर भी उसका बोध किया जा सकता है, उसे विज्ञान कहते हैं।

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