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अयंगर योगः एक-एक पल को जीना... वीरभद्रासन

रजवी एच मेहता Updated Sun, 15 Jul 2018 08:06 AM IST
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जो दार्शनिक होते हैं अक्सर हमें बताते हैं 'इस पल को जियो', 'वर्तमान समय में रहो'। जो कुछ भी बीत गया है हमें उससे जुड़े नहीं रहना चाहिए। अगर कोई दुखद घटना हमारे साथ घटित हुई है तो समय के साथ ठीक हो जाएगा। आपको इस बारे में नहीं सोचना चाहिए। वहीं दूसरी तरफ वो हमें बताते हैं कि हमें अपना काम अच्छी तरह से करना चाहिए। इससे हमारा भविष्य अच्छा होगा। वास्तव में ये अद्भुत विचार हैं लेकिन सवाल उठता है कि इनमें से एक भी अपने ऊपर कैसे लागू किया जाए।
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अगर कोई भी व्यक्ति किसी काम में असफल हो जाता है तो डर बना रहता है। शायद यही वजह है कि एक बच्चे को बड़ों की अपेक्षा कम डर होता है। एक उदाहरण ही लीजिए जैैसे कोई व्यक्ति जिसने कुछ गर्म पीते समय अपनी जीभ जलायी है ऐसे में उसे छांछ भी पीते हुए डर लगेगा। अगर किसी ने कुछ हासिल किया है तो यह स्वाभाविक है कि हम इसे दूसरों के साथ साझा करना चाहते हैं। कभी-कभी तो हम इससे आगे भी बढ़ जाते हैं। मुद्दा ये है है कि चाहे खुशी हो या दुख वो हमारे साथ है और इसे भूलना आसान नहीं है। शायद इसी वजह से कहा जाता है कि 'भूल जाओ और माफ करो'। एक बार फिर ऐसा कहना आसान है। 

हमारा अतीत हमेशा हमारे साथ रहता है। मन भी भविष्य के बारे में ही सोचता है। दोबारा हम कह सकते हैं कि जो किस्मत में है वह तो होगा ही। अंग्रेजी फिल्म के प्रसिद्ध गीत की तरह 'क्यू सेरा सेरा- जो कुछ भी होना है होगा ही।' लेकिन यह असंभव है कि ये भविष्य खासकर वर्तमान समय के लक्ष्यों के बारे में है। शिक्षा की जो स्थिति है इन दिनों उसमें ऐसा है कि आपको एक निर्धारित प्रतिशत अंक लाने का दबाव होता है ना कि सीखने पर जोर दिया जाता है। ऐसा इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज में प्रवेश परीक्षा पास करने के लिए है। प्रवेश परीक्षा का उद्देश्य अलग-अलग व्यवसायों के लिए सही योग्यता वाले छात्रों का चयन करना है लेकिन कोचिंग सेंटर्स का लक्ष्य योग्यता के आधार पर चयन नहीं बल्कि किसी तरह परीक्षा को पास करना सिखाया जाता है। जब सभी छात्र परीक्षा में पास नहीं होते हैं तो उनके परिवार में उदासी का माहौल होता है। ऐसे में जाहिर है यह पूरा व्यापार लक्ष्य को साधने के लिए है ना कि संतुष्ट के लिए। एक खुश ग्राहक वर्तमान के बारे में बात नहीं करेगा। यह पूरा विचार ही भविष्य को लेकर बुना गया है। वास्तव में, देवताओं ने लोगों को एक बेहतर भविष्य के बारे में बात करके लुभाया है।

इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि ज्यादातर लोग दर्शन को रिटायर्ड लोगों के लिए मानते हैं जो कि उनके बुढ़ापे के लिए बनाई गई योजना है। गुरुजी अयंगर बहुत ही व्यवहारिक व्यक्ति थे। उन्होंने दर्शन की बातें केवल मंच पर नहीं बोली बल्कि उसे लोगों की वास्तविक जिंदगी में उतारा। जिससे लोगों को अपने वर्तमान में जीने में मदद मिली। मुझे अभी 2011 में गुजरात में आए भूकंप की बातें याद आती हैं। 

गुजरात के कच्छ के कई गांवों में काम करने वाले एक संगठन ने भूकंप पीड़ितों को योग सिखाने के लिए हमसे संपर्क किया। हमें आयोजकों ने बताया कि उन्हें पीड़ितों की जिंदगी को फिर से सामान्य करने के लिए भारी संख्या में नकद और दूसरे दान प्राप्त हुए हैं लेकिन उस इलाके में बहुत सारी उदासी थी। डर केवल प्राकृतिक है, जब किसी ने जिंदगी, संपत्ति और इस तरह के बड़े आपदा में प्यार करने वाले हर किसी को नुकसान पहुंचाया है। उदासी असहनीय है। हमने गुरुजी अयंनगर द्वारा सिखाए गए संदेशों को लोगों तक पहुंचाया। 8 दिनों बाद एक बूढ़ी महिला मेरे पास आई और बोली, 'हमारे पास कई नेता, मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक आए हैं और हमसे बात की। उन सभी ने हमें सलाह दी कि हमें स्थिति स्वीकार करनी चाहिए हम जानते हैं कि हमने जो खो दिया है वह वापस नहीं आएगा। हम जानते हैं कि हमें इसके साथ रहना है लेकिन, आप पहले लोग थे जिन्होंने हमें बताया जीना कैसे है। आपने हमें वह तरीका बताया। यह दिल को छू लेने वाला पल था। आपने अतीत और भविष्य दोनों के डर से उबरने में मदद की। जब हम आसन का अभ्यास करते हैं, हम उस वक्त जीना सीखते हैं। गुरुजी के शब्दों में, 'हम इस पल में रहते हैं और इस पल को जीने के लिए आंदोलन में नहीं।' आज इस लेख में मैं आपको वीरभद्रासन 2 के बारे में बताएंगे।

1. तदासन में खड़े हो जाइए।
2. एक सांस के साथ कूदिए और पैरों को 4 से 4.5 फीट अलग करें। अगर आपकी लंबाई 5 फीट या इससे कम हैं तो दोनों पैरों के बीच फैलाव कम रखें अगर लंबाई इससे ज्यादा है तो पैरों का फैलाव भी ज्यादा रखिए। अगर आप पीठ दर्द, घुटने के दर्द से परेशान हैं तो मत कूदिए।
3. पैर की उंगली के बल पर खड़े होने की कोशिश करिए और सांस लें। 
4. सांस लें, बांहों को फैलाइए और कंधों तक ले आएं।
5. सांस छोड़ें, बाएं पैर को अंदर घुमाएं और दाएं पैर को पूरी तरह से बाहर की ओर करें। फिर सांस लेकर छोड़ें। 
6. सांस छोड़ें, दायें पैर को घुटने तक मोड़े जब तक कि दूसरे पैर और जांघ के बीच सीधा कोण ना बन जाए। इस स्थिति में 20 से 30 सेकेंड तक सांस लेते रहें।
8. सांस लें, पैर को सीधा करें। दाएं और बाएं पैर को अंदर की ओर मोड़ें।
9. फिर, बाईं ओर बाएं पैर को बदलकर आसन करें।
यह आसन पीठ की मांसपेशियों, पैरों और बाहों को मजबूत करती है और शरीर के इन हिस्सों में दर्द से राहत पाने में भी मदद करती है।

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