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गुरु नहीं सद्गुरु की शरण में जाएं

आचार्य श्रीराम शर्मा/ गुरु पूर्णिमा पर आचार्य श्री का संदेश Updated Fri, 20 Jul 2018 10:29 AM IST
Effective teachers are the most important factor contributing to student achievement
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गुरु का काम है मार्गदर्शन। शिष्य का कर्तव्य है उसका पालन। सांसारिक गुरुओं में स्वार्थ और अज्ञान बहुत है। उनकी सभी बातें नहीं मानी जा सकती हैं, लेकिन सद्गुरु का तो हर आदेश मानना ही चाहिए।


गुरु बाहर रहते हैं और वे सद्गुरु तक पहुंचने का रास्ता बताकर, वहां तक पहुंचाकर अपना कर्तव्य पूरा कर देते हैं। इसके बाद ‘सद्गुरु’ का कार्य आरंभ होता है, उनका परामर्श और प्रकाश ही परम-लक्ष्य तक पहुंचाने में समर्थ होता है। सद्गुरु अंतःकरण में निवास करते हैं। इसे निर्मल आत्मा या प्रकाश स्वरूप परमात्मा कह सकते हैं। प्रकाश का अर्थ रोशनी नहीं, बल्कि ‘सन्मार्ग गामिनी प्रेरणा’ है। उसे ‘ऋतम्भरा प्रज्ञा’ भी कहते हैं।


सद्गुरु का उपदेश इसी वाणी, इसी भाषा और इसी परिधि में होता है। उनका परामर्श और मार्गदर्शन हमें निरंतर उपलब्ध रहता है। बाहर के गुरु अनेक विषयों पर बात कर सकते हैं, लेकिन सद्गुरु की शिक्षा एक ही होती है कि अंधकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमृत की ओर और असत्य से सत्य की ओर चलो। बाहर के गुरु जब-तब ही मिलते हैं, उनका ज्ञान सीमित होता है और उनका उपदेश भ्रांत भी हो सकता है। मगर, अंतरात्मा में विद्यमान सद्गुरु हर समय हमारे पास और साथ उपस्थित रहता है। उसका परामर्श हमें हर समय उपलब्ध रहता है।
 

जब हम कोई बुरा काम करते हैं, तो हृदय कांपता है, मुंह सूखता है, पैर थरथराते हैं, भीतर ही भीतर कोई कोंचता रहता है। कोई देख तो नहीं रहा है, कोई सुन तो नहीं रहा, किसी को पता तो नहीं चल रहा आदि। मानो सद्गुरु बराबर रोक रहा है, समझा रहा है और धिक्कार रहा है। यह निर्देश देनेे वाली चेतना ही सद्गुरु है। जब कोई सत्कर्म करता है, तो आंतरिक संतोष अनुभव होता है। किसी भूखे को अपनी रोटी देकर उसकी भूख मिटाई जाए, किसी असहाय रोगी की चिकित्सा व्यवस्था में कुछ समय या धन लगा दिया जाए, अनीति को रोकने में स्वयं आक्रमण सह लिया जाए, तो बाहर से हर्ज और कष्ट उठाते हुए भी भीतर से इतने संतोष और उल्लास अनुभव होता है कि उसकी तुलना में वह भौतिक क्षति नगण्य ही प्रतीत होगी। यह प्रोत्साहन, समर्थन और वरदान अंतरात्मा का है, इसी को सद्गुरु का आशीर्वाद कहना चाहिए।

एक हूक, एक कसक और एक टीस सी उठती रहती है कि आगे बढ़ा जाए, ऊंचा उठा जाए। यह प्रेरणा इतनी प्रबल होती है कि रोके नहीं रुकती। जब अपना देव सोया रहता है, तब उस अमृत को दैत्य हरण कर ले जाते हैं। यह इच्छा धन, ऐश्वर्य, इंद्रिय भोग, पर सत्ता, अहंता बढ़ाने के लिए मुड़ जाती है और मनुष्य इसी बड़प्पन के जंजाल में उलझकर रह जाता है। मगर, जब सद्गुरु समर्थ होता है, तो प्रवाह को अवांछनीयता की ओर से मोड़कर वांछनीयता की दिशा में नियोजित करता है। तब प्रगति की आकांक्षा महानता के अभिवर्धन में लगती है।

सद्भावनाओं और सद्प्रवृत्तियों की संपदा ही महानता की पूंजी है। गुण कर्म और स्वभाव की उत्कृष्टता इतनी आनंददायक और इतनी समर्थ है कि उसे पाकर मनुष्य को स्वर्ग में स्थित देवताओं से बढ़कर अपने आप पर संतोष होता है। सद्गुरु कुमार्ग गामिता से रोकता है। अनर्थ मूलक चिंतन नहीं करने देता।

कुसंग में अरुचि उत्पन्न करता है। कुत्सित विचारों और भ्रष्ट व्यक्तियों के संपर्क से अरुचि ही नहीं होती, वरन् घृणा भी बढ़ती है। शक्तियों के निरर्थक कामों में अपव्यय करने वाला हास-परिहास का मनमौजी सिलसिला रुक जाता है।

समय का एक-एक क्षण बहुमूल्य प्रतीत होता है और उसके सदुपयोग की निरंतर तत्परता बनी रहती है। जब ऐसा परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगे, तो समझना चाहिए कि सद्गुरु के सच्चे शिष्य हम हो गए। गुरु का काम है मार्ग दर्शन। शिष्य का कर्तव्य है उसका  पालन। सांसारिक गुरुओं में स्वार्थ व अज्ञान भी बहुत है। उनकी सभी बातें नहीं मानी जा सकती, मगर सद्गुरु का तो हर आदेश मानना ही चाहिए।
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