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कहानी एक हार की जीत...

अमर उजाला Updated Mon, 20 Nov 2017 08:45 AM IST
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a Story of a defeat to how can you win
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मां को अपने बेटे और किसान को अपने लहलहाते खेत देखकर जो आनंद आता है, वही आनंद बाबा भारती को अपना घोड़ा देखकर आता था। भजन से जो समय बचता, वह घोड़े को अर्पण हो जाता। वह घोड़ा बहुत सुंदर और बड़ा बलवान था। बाबा भारती उसे ‘सुल्तान’ कह कर पुकारते, खुद दाना खिलाते और देख-देखकर प्रसन्न होते थे। उन्होंने रुपया, माल, असबाब, जमीन आदि अपना सबकुछ छोड़ दिया था। अब गांव से बाहर एक छोटे-से मन्दिर में रहते और भगवान का भजन करते थे। "मैं सुल्तान के बिना नहीं रह सकूंगा।" उन्हें ऐसी भ्रान्ति सी हो गई थी। वे उसकी चाल पर लट्टू थे। कहते, "ऐसे चलता है जैसे मोर घटा को देखकर नाच रहा हो।" शाम को जब तक सुल्तान पर चढ़कर आठ-दस मील का चक्कर न लगा लेते, उन्हें चैन न आता।
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वहीं, खड़गसिंह उस इलाके का प्रसिद्ध डाकू था। लोग उसका नाम सुनकर कांपते थे। सुल्तान की कीर्ति उसके कानों तक भी पहुंची। उसका हृदय उसे देखने के लिए अधीर हो उठा। वह एक दिन दोपहर के समय बाबा भारती के पास पहुंचा। बाबा भारती ने पूछा, "खड़गसिंह, क्या हाल है?" खड़गसिंह ने सिर झुकाकर उत्तर दिया, "आपकी दया है।" "कहो, इधर कैसे आ गए?" "सुल्तान की चाह खींच लाई।"बाबा भारती और खड़गसिंह अस्तबल में पहुंचे। बाबा ने घोड़ा दिखाया घमंड से, खड़गसिंह ने देखा आश्चर्य से। उसने सैकड़ों घोड़े देखे थे, परन्तु ऐसा बांका घोड़ा उसकी आंखों से कभी न गुजरा था। सोचने लगा ऐसा घोड़ा खड़गसिंह के पास होना चाहिए था। इस साधू को ऐसी चीजों से क्या लाभ? कुछ देर तक आश्चर्य से चुपचाप खड़ा रहा। बालकों-सी अधीरता से बोला, "परंतु बाबाजी, इसकी चाल न देखी तो क्या?" दूसरे के मुख से सुनने के लिए उनका हृदय अधीर हो गया। घोड़े को खोलकर बाहर गए। घोड़ा वायु-वेग से उड़ने लगा। उसकी चाल को देखकर खड़गसिंह के हृदय पर सांप लोट गया। जाते-जाते उसने कहा, "बाबाजी, मैं यह घोड़ा आपके पास न रहने दूंगा।" बाबा भारती डर गए। अब उन्हें रात को नींद न आती। परंतु कई मास बीत गए और वह न आया। 



बाबा भारती कुछ असावधान हो गए और इस भय को स्वप्न के भय की नई मिथ्या समझने लगे। संध्या का समय था। बाबा भारती सुल्तान की पीठ पर सवार होकर घूमने जा रहे थे। इस समय उनकी आंखों में चमक थी, मुख पर प्रसन्नता। सहसा एक ओर से आवाज आई, "ओ बाबा, इस कंगले की सुनते जाना।" आवाज में करुणा थी। बाबा ने घोड़े को रोक लिया। देखा, एक अपाहिज वृक्ष की छाया में पड़ा कराह रहा है। बोले, "क्यों तुम्हें क्या कष्ट है?" अपाहिज ने हाथ जोड़कर कहा, "बाबा, मैं दुखियारा हूं। मुझ पर दया करो। रामावाला यहां से तीन मील है, मुझे वहां जाना है। घोड़े पर चढ़ा लो, परमात्मा भला करेगा।" वहां तुम्हारा कौन है?


"दुर्गादत्त वैद्य का नाम आपने सुना होगा। मैं उनका सौतेला भाई हूं। "बाबा भारती ने घोड़े से उतरकर अपाहिज को घोड़े पर सवार किया और स्वयं उसकी लगाम पकड़कर धीरे-धीरे चलने लगे। सहसा उन्हें एक झटका-सा लगा और लगाम हाथ से छूट गई। उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब उन्होंने देखा कि अपाहिज घोड़े की पीठ पर तनकर बैठा है और घोड़े को दौड़ाए लिए जा रहा है। उनके मुख से भय, विस्मय और निराशा से मिली हुई चीख निकल गई। वह अपाहिज डाकू खड़गसिंह था। बाबा भारती कुछ देर तक चुप रहे और कुछ समय पश्चात कुछ निश्चय करके पूरे बल से चिल्लाकर बोले, "जरा ठहर जाओ।" खड़गसिंह ने यह आवाज सुनकर घोड़ा रोक लिया और कहा, बाबाजी, यह घोड़ा अब न दूंगा। परंतु एक बात सुनते जाओ। खड़गसिंह ठहर गया। बाबा भारती ने निकट जाकर उसकी ओर देखा और कहा, "यह घोड़ा तुम्हारा हो चुका है। मैं तुमसे इसे वापस करने के लिए न कहूंगा। केवल एक प्रार्थना करता हूं कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना।"


खड़गसिंह का मुंह आश्चर्य से खुला रह गया। उसका विचार था कि उसे घोड़े को लेकर यहां से भागना पड़ेगा, परंतु बाबा भारती ने स्वयं उसे कहा कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना। इससे क्या प्रयोजन सिद्ध हो सकता है? खड़गसिंह ने बहुत सोचा, बहुत सिर मारा, परंतु कुछ समझ न सका। हारकर उसने  अपनी आंखें बाबा भारती के मुख पर गड़ा दीं और पूछा, "बाबाजी, इसमें आपको क्या डर है?" सुनकर बाबा भारती ने उत्तर दिया, "लोगों को यदि इस घटना का पता चला, तो वे दीन-दुखियों पर विश्वास न करेंगे।" 



बाबा भारती चले गए, परंतु उनके शब्द खड़गसिंह के कानों में गूंज रहे थे। सोचता था, कैसे ऊंचे विचार हैं, कैसा पवित्र भाव है! कहते थे, "इसके बिना मैं रह न सकूंगा।" इसकी रखवाली में वे कई रात सोए नहीं, परंतु आज उनके मुख पर दुख की रेखा तक दिखाई न पड़ती थी। उन्हें केवल यह ख्याल था कि कहीं लोग दीन-दुखियों पर विश्वास करना न छोड़ दें। ऐसा मनुष्य, मनुष्य नहीं देवता है। रात्रि के अंधकार में खड़गसिंह बाबा भारती के मंदिर पहुंचा। चारों ओर सन्नाटा था। आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे। थोड़ी दूर पर गांवों के कुत्ते भौंक रहे थे। खड़गसिंह सुल्तान की बाग पकड़े हुए था। वह धीरे-धीरे अस्तबल के फाटक पर पहुंचा। फाटक खुला पड़ा था। खड़गसिंह ने आगे बढ़कर सुलतान को उसके स्थान पर बांध दिया और बाहर निकलकर सावधानी से फाटक बंद कर दिया। 


इस समय उसकी आंखों में नेकी के आंसू थे। रात्रि का तीसरा पहर बीत चुका था। चौथा पहर आरंभ होते ही बाबा भारती ने अपनी कुटिया से बाहर निकल ठंडे जल से स्नान किया। उसके पश्चात, उनके पांव अस्तबल की ओर बढ़े, परंतु फाटक पर पहुंचकर उनको अपनी भूल प्रतीत हुई। वे वहीं रुक गए। घोड़े ने अपने स्वामी के पांवों की चाप को पहचान लिया और जोर से हिनहिनाया। अब बाबा भारती आश्चर्य और प्रसन्नता से दौड़ते हुए अंदर घुसे और अपने प्यारे घोड़े के गले से लिपटकर इस प्रकार रोने लगे मानो कोई पिता बहुत दिन से बिछड़े हुए पुत्र से मिल रहा हो। बार-बार उसकी पीठ पर हाथ फेरते, बार-बार उसके मुंह पर थपकियां देते। फिर वे संतोष से बोले, "अब कोई दीन-दुखियों से मुंह न मोड़ेगा।"

सुदर्शन- (1895-1967) 
साभार, मनोरंजन डेस्क, अमर उजाला
 

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