आस्था: त्रिनेत्र गणपति के पास आते है रोज हजारों पत्र, अरदास लगाने से मनोकामना होती है पूरी

vinod shukla अनीता जैन, वास्तुविद Published by: विनोद शुक्ला
Updated Fri, 22 Jan 2021 01:21 PM IST
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इस मंदिर में भगवान गणेश त्रिनेत्र रूप में विराजमान हैं, जिसमें तीसरा नेत्र ज्ञान का प्रतीक माना जाता है।
इस मंदिर में भगवान गणेश त्रिनेत्र रूप में विराजमान हैं, जिसमें तीसरा नेत्र ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। - फोटो : अमर उजाला

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राजस्थान के रणथम्भौर दुर्ग में स्थित त्रिनेत्र गणेश मंदिर पूरे विश्व में एक मात्र ऐसा मंदिर है जहां हर वर्ष करोड़ों की संख्या में भगवान गणेश को चिटिठ्यां और निमंत्रण कार्ड भेजे जाते हैं। भगवान गणेश को आने वाले निमंत्रण पत्रों पर रणथम्भौर गणेश जी का पता भी लिखा जाता है। डाकिया इन पत्रों को श्रद्धा और सम्मान से पहुंचाते हैं, जिन्हे मंदिर के पुजारी इन निमन्त्रण पत्रों को भगवान त्रिनेत्र गणेश को पढ़ कर सुनाते है। मान्यता है कि भगवान त्रिनेत्र गणेश को निमंत्रण भेजने से हर कार्य र्निविग्घन पूर्ण हो जाता है। पूरी दुनिया में यह इकलौता ऐसा गणेश मंदिर है, जहां श्री गणेश की तीन नेत्रों वाली प्रतिमा विराजमान है एवं जहाँ गणपति बप्पा अपने पूरे परिवार, दो पत्नी रिद्धि और सिद्धि एवं दो पुत्र-शुभ और लाभ के साथ विराजमान हैं।
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ऐसे बने त्रिनेत्र गणेशजी
इस मंदिर में भगवान गणेश त्रिनेत्र रूप में विराजमान हैं, जिसमें तीसरा नेत्र ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। गजवंदनम चितयम नामक ग्रंथ में विनायक के तीसरे नेत्र का वर्णंन किया गया है। मान्यता है कि भगवान शिव ने अपना तीसरा नेत्र उत्तराधिकारी के रूप में गणपति को सौंप दिया था और इस तरह महादेव की समस्त शक्तियां गजानन में निहित हो गईं और वे त्रिनेत्र बने। देश में चार स्वयंभू गणेश मंदिर हैं जिनमें रणथम्भौर स्थित त्रिनेत्र गणेश जी प्रथम हैं। रणथम्भौर त्रिनेत्र गणेशजी का मंदिर प्रसिद्द रणथम्भौर टाइगर रिज़र्व एरिया में स्थित है, इसे रणतभँवर मंदिर भी कहा जाता है। यह मंदिर 1579 फ़ीट ऊंचाई पर अरावली और विंध्यांचल की पहाड़ियों में स्थित है। मंदिर तक पहुँचने के लिए बहुत सीढियां चढ़नी पडती हैं।
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पत्रों से मनोकामना होती है पूरी

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