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Shradh Paksha 2019: क्या है गया में श्राद्ध और पिंडदान का महत्व

धर्म डेस्क, अमर उजाला Updated Mon, 16 Sep 2019 08:22 AM IST
pitru paksha 2019
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श्राद्ध यानी श्रद्धा पूर्वक अपने पितरों के प्रति सम्मान प्रगट करना। पितृपक्ष जिसे महालय या श्राद्ध पक्ष भी कहा जाता है। श्राद्ध पक्ष अपने पूर्वजों को जो इस धरती पर नहीं है एक विशेष समय में 16 दिनों की अवधि तक सम्मान दिया जाता है, इस अवधि को पितृ पक्ष अर्थात श्राद्ध पक्ष कहते हैं। हिंदू धर्म में श्राद्ध का विशेष महत्व होता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार जब सूर्य का प्रवेश कन्या राशि में होता है तो, उसी दौरान पितृ पक्ष मनाया जाता है।  पितरों की आत्मा की शांति के लिए पितृ पक्ष में तर्पण और पिंडदान को सर्वोत्तम माना गया है।
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पिंडदान और श्राद्ध पूजा के लिए गया की धरती को श्रेष्ठ और शुभ माना गया है। शास्त्रों में गया को विशेष महत्व दिया गया है। गया की भूमि को पांचवां धाम भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि गया में पिंडदान और श्राद्ध पूजा करने से पितरों का मुक्ति मिल जाती है। गया भारत के बिहार राज्य में स्थित हैं। भगवान विष्णु ने इसी जगह पर गयासुर नाम के राक्षस का वध किया था जिसके कारण इसका नाम गया पड़ा। ऐसी मान्यता है कि भगवान विष्णु के चरण गया में उपस्थित हैं।

गया जो फल्गु नामक नदी पर स्थित है, त्रेता युग में भगवान राम और सीताजी ने भी राजा दशरथ की आत्मा की शांति के लिए गया में ही पिंडदान किया था। तभी से इस स्थान महत्व है।  दूर-दूर से लोग यहां पर आकर पूजा पाठ करते हैं तथा अपने पितरों का पिंडदान करते हैं।

पितृपक्ष के दौरान गया में कर्मकांड का विधि विधान अलग-अलग है। श्रद्धालु एक दिन, तीन दिन, सात दिन, पंद्रह दिन और 17 दिन का कर्मकांड करते हैं। अग्नि  जल और अन्न के माध्यम से गया में श्राद्ध पूजा करने पर हमारे पितरों तक पहुँचाकर उन्हें तृप्ति किया जाता है।

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श्राद्ध किसे कहते हैं?
श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धा पूर्वक अपने पूर्वजों को जो इस समय जीवित नहीं है उनका आभार प्रगट करना। शास्त्रों के अनुसार पितृपक्ष के दौरान ऐसे परिजन जो अपने शरीर को छोड़कर चले गए हैं, उनकी आत्मा के तृप्ति के लिए उन्हें तर्पण दिया जाता है, इसे ही श्राद्ध कहा जाता है। ऐसी कहा जाता है कि पितृपक्ष में मृत्यु के देवता यमराज इन जीवो को कुछ समय के लिए मुक्त कर देते हैं, ताकि ये धरती पर जाकर तर्पण ग्रहण कर सकें।

कौन कहलाते हैं पितर
ऐसे व्यक्ति जो इस धरती पर जन्म लेने के बाद जीवित नहीं है उन्हें पितर कहते हैं। ये विवाहित हों या अविवाहित, बच्चा हो या बुजुर्ग, स्त्री हो या पुरुष उनकी मृत्यु हो चुकी है उन्हें पितर कहा जाता है। पितरों की आत्मा की शांति के लिए भाद्रपद महीने के पितृपक्ष में उनको तर्पण दिया जाता है। पितर पक्ष समाप्त होते ही  परिजनों को आशीर्वाद देते हुए पितरगण वापस मृत्युलोक चले जाते हैं। 

पितृपक्ष में कैसे करें श्राद्ध
श्राद्ध पक्ष के दिनों में पूजा और तर्पण करें। पितरों के लिए बनाए गए भोजन के चार ग्रास निकालें और उसमें से एक हिस्सा गाय, दूसरा हिस्सा कुत्ते, तीसरा हिस्सा कौए और एक हिस्सा अतिथि के लिए रख दें। गाय, कुत्ते और कौए को भोजन देने के बाद ब्राह्मण को भोजन कराएं। 

श्राद्ध की महत्वपूर्ण तारीखें

पंचमी श्राद्ध- जिन पितरो की मृत्यु पंचमी तिथि को हुई हो या अविवाहित स्थिति में हुई है तो उनके लिए पंचमी तिथि का श्राद्ध किया जाता है।

नवमी श्राद्ध - नवमी तिथि को मातृनवमी के नाम से भी जाना जाता है। इस तिथि पर श्राद्ध करने से कुल की सभी दिवंगत महिलाओं का श्राद्ध हो जाता है।

चतुर्दशी श्राद्ध- इस तिथि उन परिजनों का श्राद्ध किया जाता है जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो 

सर्वपितृ अमावस्या- जिन लोगों के मृत्यु के दिन की सही-सही जानकारी न हो, उनका श्राद्ध अमावस्या को किया जाता है।

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