अर्जुन ने उर्वशी नाम की अप्सरा का प्रेम प्रस्ताव ठुकराया, क्यों

पांडुरंग शास्त्री Updated Sat, 05 Mar 2016 07:17 PM IST
उर्वशी
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इंद्र के सारथी मातलि अर्जुन को इंद्र की नगरी अमरावती ले गए। इंद्र ने अर्जुन के लिए उपयुक्त व्यवस्था कर दी। अर्जुन ने वहां देवताओं से दिव्य और अलौकिक अस्त्र-शस्त्र प्राप्त किए और उनके प्रयोग की विधि सीखी।
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उन्हें चलाने का अभ्यास किया। उसके बाद उन्होंने वापस जाने की अनुमति मांगी, तो इंद्र ने कहा, वत्स! बेहतर होगा अगर तुम चित्रसेन गंधर्व से संगीत और नृत्य कला भी सीख लो। चित्रसेन ने इंद्र का आदेश पाकर अर्जुन को संगीत और नृत्य की कला में निपुण कर दिया।


जब चित्रसेन अर्जुन को संगीत और नृत्य की शिक्षा दे रहे थे, तब इंद्रलोक की अप्सरा उर्वशी भी शिक्षण और अभ्यास के दौरान वहां आती रहती थी। वह देखते-देखते अर्जुन पर मुग्ध हो गई। अवसर पाकर उर्वशी ने अर्जुन से कहा, हे अर्जुन! मैं आपको चाहने लगी हूं। मेरे साथ विहार करके मेरी वासना को शांत करें।

उर्वशी के वचन सुन सकपकाए अर्जुन

अर्जुन
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उर्वशी के वचन सुनकर अर्जुन सकपका गए। वह उर्वशी से बोले, हे देवी! हमारे पूर्वज ने आपसे विवाह करके हमारे वंश का गौरव बढ़ाया था। पुरु वंश की जननी होने के नाते आप मेरी मां के तुल्य हैं। देवी! मैं आपको प्रणाम करता हूं।

अर्जुन की बातों से उर्वशी के मन में बड़ा क्षोभ उत्पन्न हुआ। अर्जुन के उत्तर से वह पहले क्षुब्ध हुई और फिर रोष से भरकर बोली, तुमने नपुंसकों जैसे वचन कहे हैं। तुम्हें मेरा शाप है कि तुम एक वर्ष तक पुंसत्वहीन रहोगे।

यह कहकर उर्वशी वहां से चली गई। इंद्र को इस घटना का पता चला, तो वह बोले, वत्स! तुमने जो व्यवहार किया, वह तुम्हारे योग्य ही था। उर्वशी का यह शाप भी भगवान की इच्छा थी। यह शाप तुम्हारे अज्ञातवास के समय काम आएगा।
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