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पर्युषण पर्व : क्षमा वीरस्य भूषणं, सिर्फ बड़ों से ही क्षमा नहीं

अनीता जैन, वास्तुविद Updated Sun, 15 Sep 2019 09:10 AM IST
paryushan parv importance
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क्षमापर्व जैन धर्म में मनाया जाने वाला ऐसा पावन पर्व है जो पर्युषण पर्व या दसलक्षण पर्व के अंतिम दिन आकर समूचे देशवासियों को सुख-शान्ति का सन्देश देता है। यह पावन पर्व सिर्फ जैन समाज को ही नहीं बल्कि सभी समाज जन को अपने अहंकार और क्रोध का त्याग करके धैर्य के रथ पर सवार होकर सादा जीवन जीने ,उच्च विचारों को अपनाने की प्रेरणा देता है। 
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क्षमा भाव के बारे में भगवान महावीर कहते हैं कि -''क्षमा वीरस्य भूषणं '' अर्थात क्षमा वीरों का आभूषण होता है। क्षमा पर्व की समाज व राष्ट्र के निर्माण में अहम भूमिका है। क्षमा का मार्ग अतुलनीय होता है एवं सबसे बड़ा बल क्षमा है। यदि इसका सही ढंग से ,सही जगह पर प्रयोग किया जाए तो निश्चित ही यह सर्वशक्तिमान है, अगर क्रोध ही सर्वशक्तिमान होता और क्षमा निर्बल होती तो पृथ्वी पर इतने युद्ध होने के बाद भी सारी समस्याएं हल हो जानी चाहिएं थीं, पर नहीं हुईं । 

क्षमा हमें हमारे पापों से दूर करके मोक्ष मार्ग दिखाती है। किसी भी धर्म की किताब का अगर हम अनुसरण करते हैं तो उसमें भी क्षमा भाव को ही सबसे ज्यादा महत्व दिया गया है, परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है ,ऐसे में हमें परिवर्तन का मार्ग अपनाकर धर्म के सही रास्ते पर चलना चाहिए। यह पर्व हमें सहनशीलता से रहने की प्रेरणा देता है। क्रोध को पैदा न होने देना और अगर हो भी जाए तो अपने विवेक से,नम्रता से उसे विफल कर देना अपने भीतर आने वाले क्रोध के कारण को ढूंढकर उससे उत्पन्न होने वाले दुष्परिणामों के बारे में सोचना अपने क्रोध को क्षमा रूपी अमृत पिलाकर स्वयं को व दूसरों को भी क्षमा की नज़रों से देखना चाहिए।

सिर्फ बड़ों से ही क्षमा नहीं
क्षमा का मतलब सिर्फ बड़ों से ही क्षमा मांगना कतई नहीं है, अपनी गलती होने पर बड़े हों या छोटे सभी से क्षमा मांगना ही इस पर्व का उद्देश्य है। यह पर्व हमें यह शिक्षा देता है कि आपकी भावना अच्छी है तो दैनिक व्यवहार में होने वाली छोटी- मोटी त्रुटियों को अनदेखा करें और उनसे सीख लेकर फिर कोई नई गलती न करने की प्रेरणा देता है। यह पर्व हमें ज्ञात कराता है क़ि हम अपने में सुधार का प्रयास सदैव जारी रखें ,स्वयं की अच्छाइयों व अच्छे कार्यों को प्रोत्साहित करके ऎसी ही सकारात्मक सोच दूसरों के  प्रति  भी रखते हुए समता और संयम का भाव अपने जीवन में उतार कर सभी को एक नज़रिए  से देखने की प्रेरणा देता है। 

क्षमा करने से आप दोहरा लाभ लेते हैं एक तो सामने वाले को आत्मग्लानि भाव से मुक्त करते हैं व दिलों की दूरियों को दूर कर सहज वातावरण का निर्माण करके उसके दिल में फिर से अपने लिए एक अच्छी जगह बना लेते हैं।

हम सब यह क्यों भूल जाते हैं क़ि हम इंसान हैं और इंसानों से गलतियां हो जाना स्वाभाविक है। ये गलतियां या तो हमसे हमारी परिस्थितियां करवाती हैं या अज्ञानतावश हो जाती हैं तो अनजाने में  हुई ऐसी गलतियों पर न  हमें दूसरों को सज़ा देने का हक़ है , न स्वयं को । यदि आपको संतुष्टि के लिए कुछ देना है तो दीजिए ' क्षमा ' ।सत्य ,अहिंसा और क्षमा का रास्ता ही  समाज , देश , दुनिया को बचाने और शांतिपूर्ण जीवन जीने का सही रास्ता है। सदैव याद  रखिए क़ि क्षमा मांगने वाले से ऊंचा स्थान क्षमा देने वाले का होता है ।
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