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बदले मौसम में सेब बगीचों पर वूली एफिड का फिर हमला

अमर उजाला ब्यूरो, शिमला Updated Wed, 17 Jan 2018 02:23 PM IST
woolly aphids attack apple trees
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हिमाचल के सेब बगीचों पर अक्तूबर और नवंबर के बाद अब जनवरी में वूली एफिड ने फिर हमला बोल दिया है। शुष्क मौसम की वजह से पेड़ों की शाखाओं पर बर्फ की बजाय वूली एफिड कीट कॉटन की तरह दिखने वाला सफेद रंग का मोम जैसा पदार्थ छोड़ रहा है।
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इससे सेब बागवान परेशान हैं। आमतौर पर यह कीट अक्तूबर और नवंबर महीनों में आक्रमण करता है, मगर अब जनवरी मध्य में भी इसका हमला होने लगा है। प्रदेश में सेब बागवानी पर मौसम की कई तरह से मार पड़ने लगी है।


एक ओर जहां बगीचों में मिट्टी नरम करने और पौधरोपण के लिए पर्याप्त नमी नहीं होने के कारण ये सारे काम अटक गए हैं, वहीं अब कई रोग भी पनपने लगे हैं। इन रोगों में वूली एफिड बगीचों में फैल चुका है।

बागवानी के लिए मशहूर रोहडू़ क्षेत्र के बराल गांव के प्रगतिशील बागवान सुरेश पांजटा ने भी कहा कि सेब बागवानी के लिए मौसम प्रतिकूल चल रहा है। इससे राज्य की सेब बागवानी प्रभावित हो सकती है। वूली एफिड का समय रहते इलाज न हुआ तो यह काफी नुकसान कर सकता है। ये कीट सेब के बगीचों में रस चूस लेते हैं। 

क्या है वूली एफिड
वूली एफिड पेड़ की टहनी से रस चूसने वाले कीट हैं। ये पौधे में पाए जाने वाले तरल पदार्थ पर इकट्ठा हो जाते हैं। कॉटन या ऊन की तरह दिखने वाला एक सफेद रंग का मोम की तरह का पदार्थ छोड़ते हैं।

इनमें वयस्क कीट एक से दूसरी जगह के लिए उड़ सकते हैं। दूसरे स्थान पर बैठकर बड़ी मात्रा में अंडे देते हैं। ऊनी शाखा पर इन कीटों के लारवा बड़ी मात्रा में कॉटन की तरह का पदार्थ तैयार करते हैं, जिससे कि शिकार करने वाले जीवों से बचाव हो सके।

वूली एफिड की कई प्रजातियां हैं। सेब के पेड़ों पर एरियोसोमा लेरिजेरम नाम का वूली एप्पल एफिड होता है। इनके संक्रमण से पेड़ पर पाउडरी मिल्डयू फंगस का भी प्रकोप हो जाता है। ऐसे संक्रमण से पेड़ रोगी हो जाता है।  

शुष्क मौसम से बढ़ा वूली एफिड का प्रकोप
डॉ. वाईएस परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय के निदेशक विस्तार डॉ. विजय सिंह ठाकुर का कहना है कि आजकल अक्तूबर-नवंबर वाला शुष्क मौसम हो गया है। आमतौर पर वूली एफिड का हमला अक्तूबर और नवंबर महीनों में होता है।

इन दिनों मौसम नमी वाला हो जाता है, मगर मौसम में आए इस बदलाव से सेब के बगीचे वूली एफिड की चपेट में आ गए हैं। इसका सेब की फसल पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। स्थानीय विशेषज्ञों से चर्चा करके ही लोग विश्वविद्यालय की ओर से जिन कीटनाशक दवाओं की संस्तुति की गई है, उनका छिड़काव करें।

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