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सिंधु जल संधि: अपना ही पानी इस्तेमाल नहीं कर पा रहा हिमाचल

बविंद्र वशिष्ठ/अमर उजाला, शिमला Updated Wed, 28 Sep 2016 09:54 AM IST
Indus Water Treaty setback for Himachal Pradesh
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पाकिस्तान के साथ 56 साल पुरानी सिंधु जल संधि के कारण हिमाचल अपने ही पानी का इस्तेमाल नहीं कर पा रहा है। लाहौल-स्पीति से निकलने वाली चिनाब पर न बिजली प्रोजेक्ट लग पा रहे हैं और न ही इस नदी का पानी सिंचाई के काम आ रहा है। संधि में प्रावधान होने के बावजूद चिनाब बेसिन पर हर छोटे-बड़े प्रोजेक्ट पर पाकिस्तान आपत्ति करता रहा है।



वर्तमान में चिनाब पर हिमाचल की करीब आधा दर्जन परियोजनाओं को इंडस वाटर कमिश्नर की हरी झंडी नहीं मिली है। गौरतलब है कि पाकिस्तान चिनाब, झेलम और सिंधु नदियों पर बनने वाले लगभग 30 बिजली प्रोजेक्टों पर आपत्ति दर्ज करवा चुका है। इनमें


बिना पानी रोके बना लाहौल का 4.5 मेगावाट का थियोट प्रोजेक्ट भी शामिल है। सिंधु जल समझौते के तहत तीन पश्चिमी नदियां चिनाब, झेलम एवं सिंधु का पानी पाकिस्तान को दिया गया है। बिजली उत्पादन, कृषि आदि के लिए इन नदियों के पानी के सीमित इस्तेमाल का अधिकार भारत को है।

चिनाब बेसिन में 3177 मेगावाट बिजली पैदा करने की क्षमता

चिनाब का उद्गम हिमाचल के लाहौल-स्पीति से है। यहां इस नदी को चंद्रभागा कहते हैं। जेएंडके में प्रवेश करते ही इसका नाम चिनाब हो जाता है। हिमाचल के करीब 960 किलोमीटर क्षेत्र में औसतन 800.60 क्यूसिक मीटर पानी लेकर बहने वाली इस नदी का उपयोग हिमाचल नहीं कर पा रहा।

आलू और मटर जैसी कई फसलों के लिए मशहूर लाहौल में ही खेती के लिए इस नदी के पानी का उपयोग न के बराबर होता है। प्रदेश में चिनाब बेसिन में 3177 मेगावाट बिजली पैदा करने की क्षमता है लेकिन अभी तक महज 5.3 मेगावाट बिजली ही पैदा हो पा रही है।

चिनाब बेसिन पर प्रस्तावित जिस्पा, सेली, रियोली-डुगली, साच खास, डुगर और म्याड़ जैसे बड़े विद्युत प्रोजेक्टों को सिंधु जल आयोग से हरी झंडी नहीं मिली है। संधि के चलते भारत अभी पाकिस्तान पर दबाव नहीं बना पा रहा था। सोमवार को सिंधु जल संधि की समीक्षा बैठक में पीएम मोदी के स्पष्ट संदेश के बाद हिमाचल में भी उम्मीद की किरण जगी है।

चिनाब को रावी में मिलाने की थी योजना

अंग्रेजों के जमाने में चिनाब (चंद्रभागा) के पानी को रावी नदी में मिलाने की योजना थी। सिंधु नदी पर ब्रिटिश लेखक एलॉय एम मिशेल की चर्चित किताब ‘द इंडस रिवर’ में इसका जिक्र है। किताब में लिखा गया है कि पंजाब की अपर बारी दुआबा नहर में पानी कम होने पर अंग्रेजों ने टनल के माध्यम से चंद्रभागा के पानी को रावी में मिलाने की योजना भी बनाई थी।

इतिहासकार और हिमालय के जानकार छेरिंग दोरजे कहते हैं कि इसके लिए लाहौल के तिंदी से चंबा के लिए सुरंग बनाने का प्रस्ताव था। इतना ही नहीं, चिनाब की सहायक नदी चंद्रा के बेसिन से पानी को कुल्लू में पार्वती से मिलाने का सुझाव भी दिया गया था। अब सिंधु जल संधि के कारण ये संभव नहीं है।

सिंधु जल संधि के कारण पाकिस्तान चिनाब बेसिन पर बनने वाले हर छोटे-बड़े प्रोजेक्ट पर आपत्ति लगाता रहा है। हिमाचल में चिनाब पर जिस्पा समेत कई बड़े प्रोजेक्ट प्रस्तावित हैं, इन्हें सिरे चढ़ाने की कोशिश की जा रही है। -डीके शर्मा, प्रबंध निदेशक, हिमाचल प्रदेश पावर कॉरपोरेशन
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