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धामी से धधके थे आजादी के लिए अंगारे

Shimla Updated Mon, 13 Aug 2012 12:00 PM IST
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शिमला। स्वतंत्रता संग्राम में धामी गोलीकांड विशेष महत्व रखता है। हिमाचल से ब्रिटिश हुकूमत की दमनकारी नीतियों के खिलाफ यहां के लोगों ने आंदोलन का जो बिगुल फूंका था, उसकी गूंज पूरे देश में सुनाई पड़ी थी। प्रदेश में धामी गोलीकांड व इस स्थान के विकास के लिए भले ही कोई प्रयास नहीं किए गए हों, लेकिन जब-जब स्वतंत्रता संग्राम का जिक्र होता है तो शहीदों के बलिदान को विशेष रूप से याद किया जाता है।
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16 जुलाई 1939 को धामी में प्रजामंडल के कार्यकर्ताओं ने तत्कालीन रियासत के राजा की जनता विरोधी नीतियों को देखते हुए शिमला से भागमल सोहटा और पंडित सीताराम शर्मा के नेतृत्व में हजारों लोगों की उपस्थिति में राजमहल के बाहर धरना-प्रदर्शन व नारेबाजी की। थोड़ी देर बाद भीड़ बेकाबू हो गई और पथराव शुरू हो गया। राजा के सिपाहियों ने उग्र भीड़ को काबू करने के लिए उन पर लाठीचार्ज कर दिया। बाद में गोलियां चलाना शुरू दी। गोलीबारी में दो लोगों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि दो अन्य लोगों ने उपचार के लिए ले जाते वक्त रास्ते में दम तोड़ दिया। धामी गोलीकांड की इस घटना से पूरे देश में असंतोष फैल गया।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने पंजाब के मशहूर वकील दुनी चंद की अध्यक्षता में सारे कांड की जांच करने के लिए एक समिति का गठन किया। इस बीच राजा धामी व अंग्रेज सरकार ने मिलकर प्रजामंडल के कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां, उनके सामान की कुर्की और देश निकाला जैसे आदेश पारित कर आंदोलन को कुचलने की कोशिश की। इस तरह के फैसले से पूरी रियासत में राजा के विरुद्ध लोगों का आक्रोश और ज्यादा बढ़ गया। यह देखते हुए तत्कालीन राजा ने ब्रिटिश आर्मी की एक टुकड़ी को रियासत के मुख्यालय धामी में बुला लिया। प्रजामंडल व स्वराजियों के घरों आदि को सील करवा दिया। 1941 में समझौता कांड उसी की शृंखला में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह था।

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