विजिलेंस हेडक्वार्टर में ‘धाटू’ वाली सबकी मामी

Shimla Updated Mon, 23 Jul 2012 12:00 PM IST
शिमला। अफसरों से लेकर आम कर्मचारियों तक सबकी मामी है ‘धाटू’ वाली कौशल्या देवी। 51 साल की कौशल्या देवी अपने रिवाज को छोड़ने को तैयार नहीं। वह कहती हैं - कई दफा मुझे कुछ लोगों ने पूछा भी कि मैं चुनरी क्यों नहीं पहन लेती? मेरा जवाब रहता है, क्याें पहनूं मैं? अपने रिवाज को क्यों छोडूं? पुलिस की नौकरी करूंगी, तो केवल धाटू पहनकर।
कौशल्या देवी ने कहा - विजिलेंस के अफसरों और कर्मचारियों का काम है रिश्वत लेने वालों को पकड़ना। मैं ठहरी मामूली कर्मचारी। मेरा काम है जहां ड्यूटी लगे, वहां अपने घर की तरह काम करना। कोई चाय बनाने को कहे, वैसे बनाती हूं जैसे घर में। दूसरा काम भी वैसे ही। सब मुझे मामी पुकारते हैं। अच्छा आप पूछ रहे हैं कि मामी सबसे पहले किसने कहना शुरू किया? मेरी कहानी बड़ी बुरी है बेटा! मूल रूप से जिला शिमला की रामपुर तहसील की गांव खनेवली की रहने वाली हूं। दो बेटियां हैं। छोटे वाली किरण दो साल और बड़े वाली शशि चार साल की थी। मेरे पति बेलीराम पुलिस में थे। 1988 में उस वक्त खबर मिली कि उन्होंने पूह में सतलुज में छलांग लगा ली। धाटू बचपन से ही पहनती हूं। पहले सुहागिन के रंग वाला चमकीला धाटू पहनती थी। उसके बाद रंग बदरंग हो गया। 1993 में मुझे पति की जगह फोर्थ क्लास की नौकरी मिली। मेरा आपरेशन से एक किडनी निकाली, तो 1996 में विजिलेंस हेडक्वार्टर खलीणी में आई। यहां पर एक लड़का था कांस्टेबल शांता कुमार। वह मुझे मामी पुकारता था। बस तबसे लेकर सब मामी पुकारते हैं। एडिशनल डीजीपी, आईजी, डीआईजी से लेकर निचले स्तर के सारे कर्मचारी सब। हमारी लड़कियों ने धाटू पहनना छोड़ दिया है। नंगे सिर में कहां ठीक लगती हैं वे। मेरी दो दोहतियां निक्कू चौहान और नव्या चौहान हैं। मेरे साथ पुलिस लाइन में रहती हैं। वे भी कहां पहनेंगी धाटू? हमारी औरतों-लड़कियों की जो शान-पहचान धाटू में थी, वह चुनरी में कहां?

फुरू बताता है कहां का धाटू
धाटू को बांधने में जो गांठ दी जाती है, उसे फुरू कहते हैं। फुरू से ही पहचान होती है कि धाटू पहने महिला रामपुर, ठियोग, कोटखाई, चौपाल, रोहडू़, कुल्लू कहां की है? रामपुर और ठियोग में काले धाटू फुरू केवल विधवाएं पहनती हैं, तो कोटखाई में बिना फुरू के काले धाटू सुहागिनें भी।

सदियों से गीतों में गाया जा रहा धाटू
लोक गायक विक्की चौहान ने बताया कि लोक संस्कृति के प्रतीक धाटू पर महासवीं और कुल्लवी पहाड़ी में कई नाटियां हैं। इनमें से कुछ सदियों से गाई जा रही हैं। जैसे धाटू त सजअ ला पीउंणे रंग रा केड़ा सजअ सोने रा बाड़ा रे, धाटू रूबी रा लाणा, धाटू आड़िये पट्टू आड़िये, तेरा धाटकू काला मेरे जीअरा रबाड़ा आदि।

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