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राजस्थान चुनाव : जो जातीय गोलबंदी साध लेगा, विजय माला वही पहनेगा

विनोद अग्निहोत्री, जयपुर Updated Thu, 06 Dec 2018 03:59 PM IST
राजस्थान विधानसभा चुनाव लड़ रहे बड़े चेहरे
राजस्थान विधानसभा चुनाव लड़ रहे बड़े चेहरे - फोटो : Amar Ujala
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प्रचार के नगाड़े थम गए, सियासी युद्ध के दमदमे अब शांत हैं। शुक्रवार को लोग अपने घरों से निकलेंगे और अपनी अपनी पसंद की पार्टी और दल के पक्ष में मतदान करेंगे। दोनों राजनीतिक दलों के अपने अपने गणित और अनुमान हैं। सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को गुजरात जैसे करिश्में की उम्मीद है कि ले देकर भाजपा अपनी सरकार बचा लेगी। लेकिन कांग्रेसी पंजाब जैसे नतीजों की उम्मीद कर रहे हैं और उनके दावे हैं कि कम से कम 125 से 135 सीटें तक पार्टी जीतेगी और राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बनेगी। 
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भाजपाई दावा करते हैं कि केंद्र की मोदी सरकार और राज्य की वसुंधरा सरकार के कामकाज से संतुष्ट होकर लोग पार्टी के पक्ष में मतदान करेंगे, जबकि कांग्रेसी कहते हैं कि मोदी सरकार के जनविरोधी फैसलों और वसुंधरा सरकार के कुशासन के खिलाफ जनता कांग्रेस के लिए वोट करेगी। लेकिन जमीनी हकीकत है कि दोंनों ही दलों का पूरा जोर सामाजिक समीकरणों यानी जातीय गोलबंदी साधने पर है और जिसके जातीय समीकरण सध गए, 11 दिसंबर को विजय की माला उसके गले में ही पड़ेगी। 

परंपरागत वोटरों को साधने में जुटे

गुजरात की ही तरह कांग्रेस अपने पक्ष में जाटों, गूजरों, मुस्लिमों, मीणाओं, दलितों, पिछड़ों और जनजातियों का मजबूत समीकरण बनाकर जीत की तैयारी कर रही है। उसे भाजपा के परंपरागत जनाधार राजपूतों, ब्राह्मणों और वैश्यों की सरकार से नाराजगी से भी फायदा मिलने की उम्मीद है। लेकिन भाजपा ने कांग्रेस के इस जातीय समीकरण कार्ड की काट के लिए न सिर्फ अपने परंपरागत जनाधार को एकजुट रखने की पूरी कोशिश की, बल्कि योगी आदित्यनाथ और उमा भारती को चुनाव प्रचार में उतारकर हिंदुत्व का तड़का लगाकर सत्ता वापसी की उम्मीद लगा रही है। 

मुसलमान वोटर किसके साथ

पिछले कई चुनावों से राजस्थान में राजपूत, ब्राह्णण, वैश्य एकजुट होकर भाजपा के पक्ष में और जाट, गूजर, मीणा और दलित कांग्रेस के पक्ष में मतदान करते रहे हैं। जबकि आदिवासी और पिछड़ी जातियों के वोट अलग अलग क्षेत्रों में स्थानीय समीकरणों के मुताबिक दोनों दलों में बंटते रहे हैं। यहां तक कि मुसलमानों में भी ज्यादा तादाद कांग्रेस के लिए वोट करती रही है, लेकिन एक हिस्सा स्थानीय भाजपा नेताओं के लिए भी वोट करता रहा है। जैसे उदयपुर में गुलाबचंद कटारिया को स्थानीय मुसलमानों के एक ठीक ठाक हिस्से का समर्थन मिलता रहा है। लेकिन इस बार जयपुर से अजमेर, पुष्कर, पाली, जोधपुर, नाथद्वारा, उदयपुर, चित्तौड़, भीलवाड़ा, कोटा, झालावाड़, बूंदी, टोंक से जयपुर तक की लंबी यात्रा के दौरान सामाजिक समीकरणों का नजारा कुछ बदला सा दिखा। 
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