नूरी ने झटके दो गोल्ड, एक सिल्वर मेडल

Patiala Updated Mon, 24 Dec 2012 05:31 AM IST
मंडी गोबिंदगढ़(फतेहगढ़ साहिब)। ‘परिंदों को नहीं तालीम दी जाती उड़ानों की, वो खुद ही सीख लेते हैं बुलंदी आसमानों की।’ किसी शायर की इन पंक्तियों को सच कर दिखाया है खन्ना के कृष्णा नगर में रहने वाली युवती बलविंद्र कौर नूरी ने। भले जिंदगी के एक दुखद हादसे ने नूरी की आंखों की रोशनी छीन ली, फिर भी हिम्मत को मजबूत करते हुए उसने एक नहीं दर्जनों खेल और अन्य प्रतियोगिताओं में अपनी जीत का परचम लहराया है।
27 वर्षीय बलविंदर कौर नूरी ने 11 से 14 दिसंबर तक दिल्ली में करवाई गई राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता में हिस्सा लेते हुए विभिन्न प्रतियोगिताओं में दो स्वर्ण और एक रजत पदक अपने नाम कर लिया। उसने जेवेलिन थ्रो और डिस्कस थ्रो में स्वर्ण पदक और शॉटपुट में रजत पदक हासिल किया। नूरी अपनी इस शानदार जीत का श्रेय कोच दलीप सिंह राणा को देती हैं। नूरी का कहना है कि पंजाब सरकार ने उसे कोच नहीं बल्कि खोई हुई रोशनी दे दी हैं। नूरी का सपना है कि वह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेलों में हिस्सा लेकर देश के लिए मेडल जीते। इसके लिए वह कड़ी मेहनत कर रहीं हैं।
अमर उजाला टीम के साथ बात करते हुए नूरी ने बताया कि पंजाब सरकार ने उस पर भरोसा जताते हुए प्रति दिन सौ रुपये खाद्य सामग्री के लिए देने शुरू किए हैं। इसके लिए वह पूरी मेहनत करेंगी कि आगे भी देश के लिए मेडल जीत कर ला सके। नूरी ने बताया कि वह फरवरी माह में बंगलूरू में होने वाली पैरा ओलंपिक्स के लिए चुनी गई हैं। वहां उसका प्रदर्शन इंग्लैंड में होने वाली वर्ल्ड एथलेटिक चैंपियनशिप में हिस्सा लेने का रास्ता साफ करेगा।
नूरी की प्राप्ति से गदगद उसकी माता प्रकाश कौर और पिता महिंद्र सिंह अपनी सात संतानों में से चौथी संतान नूरी को अब इस से भी शानदार मुकाम पर देखना चाहते हैं। नूरी के पिता महिंद्र सिंह ने बताया कि 2001 में नूरी एक दिन अचानक रात को छत से गिर पड़ी थी, जिससे उसकी आंखों की रोशनी चली गई। उन्होंने बताया कि वे सामाजिक हालातों और कुछ आर्थिक मजबूरियों के कारण नूरी को घर से बाहर नहीं भेजना चाहते थे, लेकिन नूरी ने मेहनत करके दिखा दिया कि वो किसी से कम नहीं है। उन्हें अपनी बेटी पर बेहद नाज है। उन्होंने बताया कि नूरी अब बीए भाग 2 की पढ़ाई कर रही है।
उल्लेखनीय है कि बलविंदर कौर नूरी डांस कला में भी माहिर है और कविता भी लिखती हैं। अपनी चुनौतियों को चुनौती देती हुईं वह कहती हैं, ‘अगर फना की जिद है बिजलियां गिराने की तो हमने भी ठानी है वहीं आशियां बनने की।’

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