मुहावरों से जोड़ा कोरोना को, ताकि सीखने के साथ बदलाव को समझ सकें बच्चे

Mohali Bureauमोहाली ब्‍यूरो Updated Sun, 22 Nov 2020 01:39 AM IST
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मोहाली। कोरोना के कारण शिक्षा प्रभावित हुई है। स्कूल खुले तो हैं पर शर्तों के साथ, विद्यार्थियों की उपस्थिति भी कम ही है। लिहाजा बच्चे भी पढ़ाई को लेकर थोड़ा उदासीन हैं। ऐसे में बच्चे नया सीखें इसके लिए स्टेट अवॉर्डी शिक्षाविद डॉ. सुरिंदर कुमार जिंदल ने नया तरीका निकाल लिया है। जिसमें उन्होंने पंजाबी के मुहावरों (अखाण) को कोरोना काल के माहौल से जोड़ते हुए बच्चों के लिए नए तरीके से परिभाषित किया है।
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मुहावरे किसी भी भाषा की अभिव्यक्ति का बेहतर माध्यम हैं। इसलिए इन्हें शिक्षा पद्घति के साथ जोड़ा गया है। लेकिन देखने में आता है कि विद्यार्थी मुहावरों को परिभाषित करने वाले कुछ प्रचलित वाक्यों को ही रट लेते हैं। जिससे परीक्षा में भले ही वो अंक हासिल कर लें, लेकिन मुहावरों को अभिव्यक्ति का माध्यम बना पाने में असफल ही रहते हैं। कोरोना काल में बच्चे मुहावरों को सीखने का माध्यम बना सकें, इसका प्रयास मोहाली के एक हेड मास्टर ने किया है। स्टेट अवॉर्ड प्राप्त डॉ. सुरिंदर कुमार जिंदल यूं तो विज्ञान के अध्यापक हैं, लेकिन मातृभाषा पंजाबी में भी उन्हें महारत हासिल है। लिहाजा उन्होंने एक तीर से दो निशाने साधे। मुहावरों को उनके प्रचलित वाक्यों से अलग उन्होंने कोरोना काल में सामान्य जीवन के परिवर्तनों से जोड़ते हुए इन्हें परिभाषित किया है। इससे बच्चों को जहां मुहावरों की नई परिभाषा मिली है, वहीं कोरोना काल के हालातों और सामाजिक बदलाव को सहजता के साथ समझने का भी मौका मिला।
डॉ. जिंदल कहते हैं लॉकडाउन के दौरान भाषा के प्रति यह उनका एक प्रयास मात्र है। जिसे अध्यापक और विद्यार्थी अपनी सृजन शक्ति से और विस्तार दे सकते हैं। उन्होंने बताया कि मुहावरों को नए वाक्यों के साथ परिभाषित करते हुए इस बात का खास ध्यान रखा है कि इससे बच्चों को सकारात्मक संदेश मिले। जैसे कि कानून और नियमों का पालन करना, शहरों की अपेक्षा गांवों में आपसी स्नेह ज्यादा होना, मजदूरों-कामगारों के प्रति संवेदनशीलता, विद्यार्थियों को घर में पढ़ने के लिए प्रेरित करना, खाली समय का उपयोग स्वाध्याय के लिए करना, अफवाहों से बचना और सही जानकारी का महत्व, आर्थिक मंदी के प्रति समझ रखना और लोक सेवा को अपनाने का संदेश इनके जरिए दिया गया है।
कोरोना काल में कुछ मुहावरे यूं किए परिभाषित...
- ‘अपना घर सौ कोह तो दिस पैंदा है’ यानि अपना घर सभी को प्यारा होता है। इस मुहावरे को कोरोना से जोड़ते हुए यूं व्यक्त किया गया- कोरोना फैलने पर दूसरे राज्यों से आए मजदूर पैदल ही अपने घरों की तरफ चल दिए। जब उनसे पूछा कि सैकड़ों मील का सफर तय कर वो पैदल कैसे पहुंचेंगे, तो वो बोले- अपना घर सौ कोह तो दिस पैंदा है।
- ‘अपनी कुकड़ी चंगी होवे तां बाहर आंडे क्यों देवे’ यानि अपना छोड़ दूसरे का काम करना। इस मुहावरे को कोरोना के माहौल से यूं व्यक्त किया- कोरोना काल में लगे कर्फ्यू के दौरान सरपंच अपना गांव छोड़ दूसरे गांवों में राशन बंटवाने पहुंच गया तो गांव वाले बोले- अपनी कुकड़ी चंगी होवे तां बाहर आंडे क्यों देवे।
- ‘घर दा सड़या वण गया वण नूं लग्गी अग्ग’ यानि एक जगह से निकल कर दूसरी जगह जाना और वहां भी मुसीबत में फंस जाना। इस मुहावरे को यूं व्यक्त किया- मेरे चचेरे भाई को यहां मेडिकल में एडमिशन नहीं मिला तो चीन में डोनेशन देकर दाखिला ले लिया। वहां गए कुछ समय हुआ कि कोरोना फैल गया और उसे वहां से भी आना पड़ा, तो इसे कहा गया कि- घर दा सड़या वण गया वण नूं लग्गी अग्ग।
- ‘घड़े नू हथ्थ लाया सारा टब्बर त्याहया’ यानि थोड़े सामान की ज्यादा मांग होना। कोरोना के कारण जब कर्फ्यू में ढील दी गई तो एक दुकान पर ही चार दुकानों जितनी भीड़ हो गई। इसे देख सहसा ही मुंह से निकल गया- घड़े नू हथ्थ लाया सारा टब्बर त्याहया।
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