पंजाब के 45 हजार आढ़ती संघर्ष की राह पर

Ludhiana Updated Wed, 15 Aug 2012 12:00 PM IST
लुधियाना। पंजाब में किसानों से फसल की सीधी खरीद करने और आढ़ती सिस्टम को खत्म करने के केंद्र सरकार के प्रस्ताव पर आढ़तियों ने अपने तेवर तीखे कर लिए हैं। केंद्र के इस कदम के खिलाफ राज्य के 45 हजार आढ़ती आंदोलन की राह पर अग्रसर हैं। इसके तहत 21 अगस्त को पूरे मालवा में जिला स्तर पर रोष धरने दिए जाएंगे और प्रधानमंत्री के नाम डिप्टी कमिशभनरों को ज्ञापन दिए जाएंगे। इसके बाद 22 अगस्त को दोआबा और 23 अगस्त को मालवा ने इसी तर्ज पर रोष प्रदर्शन किए जाएंगे। आढ़तियों ने केंद्र सरकार को इस प्रस्ताव को वापस लेने के लिए 31 अगस्त तक का अल्टीमेटम दिया है। यदि सरकार ने इसे वापस नहीं लिया तो सितंबर में पहले केंद्रीय खाद्य मंत्रालय और फिर संसद के बाहर धरना दिया जाएगा। आढ़तियों ने साफ कर दिया है कि किसान और आढ़ती के बरसों पुराने रिश्ते को कतई टूटने नहीं दिया जाएगा।
काबिलेजिक्र है कि पंजाब में गेहूं एवं धान की खरीद पर पांच फीसदी वैट, तीन फीसदी इंफ्रास्ट्रक्चर टैक्स, दो फीसदी मार्केट फीस, दो फीसदी रूरल डेवलपमेंट फंड और ढाई फीसदी आढ़त वसूल की जा रही है। ऐसे में कुल 14.5 फीसदी करों का बोझ सरकार पर पड़ रहा है। अब केंद्रीय खाद्य मंत्री केवी थामस ने राज्य सरकार को पत्र लिखकर अधिक खर्च की दुहाई देते हुए मौजूदा आढ़ती सिस्टम को खत्म करके को-आपरेटिव सिस्टम को बढ़ावा देने की बात कही है। राज्य भर के आढ़ती इसका विरोध कर रहे हैं। केंद्र का तर्क है कि पंजाब में अनाज पर सरकार को साढ़े चौदह फीसदी टैक्स पड़ रहे हैं, जोकि पूरे देश में सबसे अधिक हैं। दूसरे न्यूतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के साथ ही आढ़त एवं अन्य करों का बोझ भी बढ़ जाता है, क्योंकि सभी कर फीसदी में हैं।
आढ़तिया एसोसिएशन के स्टेट प्रेसिडेंट रविंदर सिंह चीमा के अनुसार पंजाब में आढ़तियों को सालाना करीब 850 करोड़ रुपये आढ़त मिल रही है। ऐसे में प्रति वर्ष औसतन प्रति आढ़ती करीब तीन लाख रुपये कमा रहा है, जोकि सरकार के दर्जा तीन कर्मचारी के सालाना वेतन से भी कम है। एमएसपी के साथ साथ आढ़त बढ़ने की बात पर चीमा कहते हैं कि पिछले दस साल में प्रति वर्ष औसतन दस फीसदी एमएसपी बढ़ी है। इस तरह से आढ़त में भी उसी अनुपात में इजाफा हुआ है। जबकि देश में महंगाई भी आठ से दस फीसदी की रफ्तार से बढ़ी है और मुलाजिमों का महंगाई भत्ता भी उसी तर्ज पर बढ़ता है। इन हालात में आढ़ती को कोई मोटा मुनाफा नहीं हुआ है। बेहतर खरीद प्रबंधों की रीढ़ के तौर पर काम कर रहे आढ़तियों को सरकार राहत देने की बजाए बर्बाद करने पर तुली है, इसे कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

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