पंजाबी लोक गायक करनैल गिल नहीं रहे

Ludhiana Updated Mon, 25 Jun 2012 12:00 PM IST
लुधियाना। पंजाबी के जाने माने लोक गायक करनैल गिल का लंबी बीमारी के बाद रविवार को दोपहर 12 बजे अपने पुश्तैनी गांव जमालपुर अवाना में निधन हो गया। वे कैंसर की बीमारी से पीडि़त थे। उन्होंने पंजाबी लोक गायकी में अपनी एक अलग छाप छोड़ी। उनके करीब 50 एलबम रिलीज हुए। 71 वर्ष की उम्र में सुरों के साधक ने इस दुनिया को अलविदा कहा। लेकिन उनके गीत वर्षों तक लोगों के कानों में गूंजते रहेंगे। करनैल के परिवार में पत्नी, पुत्र और दो बेटियां हैं।
करनैल ने पंजाबी की मशहूर लोक गायिका सुरिंदर कौर, नरिंदर बीबा, जगमोहन कौर, मोहिनी नरूला, स्वर्ण लता, रंजीत कौर, गुलशन कोमल, कुलदीप कौर, प्रीति बाला के साथ कई गीत गाए। उन्होंने पंजाबी के प्रसिद्ध गीतकार देव थ्रीके वाला, गुरमुख गिल, बलबीर लहरा, जसवंत सदीला, सतनाम, गुरदेव सिंह, इंद्रजीत सिंह हसनपुरी के गीतों को अपनी दिलकश आवाज दी। उन्होंने अमेरिका, कनाडा, इंग्लैंड, डेनमार्क समेत कई देशों में अपनी गायकी की छाप छोड़ी। प्रो. मोहन सिंह यादगारी फाउंडेशन ने उनको दीदार संधू यादगारी पुरस्कार से सम्मानित किया था। इसके अलावा भी साहित्य जगत में उनको कई सम्मान मिले।
13 फरवरी 1942 को पाकिस्तान के जिला लायलपुर के गांव गुरुसर चक नंबर 259 में उनका जन्म हुआ था। आजादी के बाद उनका परिवार भारत आकर बस गया। पाकिस्तान जाकर अपने पुश्तैनी गांव देखने की तमन्ना उनके दिल में ही रह गई। करनैल ने जामवंत सिंह से शास्त्रीय संगीत और हरचरण गरेवाल से लोक गायकी की बारीकियां सीखीं। उनके मशहूर गीतों में रेशमी रूमाल वांगू रक्ख मुंडिया, तीयां वांगू लंघदे ने दिन मितरां, चौबारे च मेरी उठनी बैठनी, लभदा फिर कि देयोरा रूप मंडियां चो खास हैं।
प्रो. मोहन सिंह यादगारी फाउंडेशन के चेयरमैन जगदेव सिंह जस्सोवाल, प्रधान केके बावा, पूर्व मंत्री जसबीर सिंह संगरूर, परगट सिंह, निर्मल जौड़ा के अलावा पंजाबी साहित्य अकादमी के प्रधान गुरभजन गिल ने उनके निधन पर शोक जताया है। करनैल के निधन से साहित्य जगत को गहरा सदमा लगा है। लंबे अरसे तक उनकी भरपाई नहीं की जा सकती।

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