कॉलेज मैगजीन से शुरू हुआ यश चोपड़ा का कॅरियर

जालंधर/ब्यूरो Updated Mon, 22 Oct 2012 03:16 PM IST
yash chopra started his career with college magazine
फिल्म निर्देशन और निर्माण में बुलंदियां छूने वाले यश चोपड़ा अपने उस कॉलेज को हमेशा दिल में बसाए रहे, जहां से उन्होंने आसमां की उड़ान की शुरुआत की थी। पढ़ाई के दौरान जालंधर के दोआबा कॉलेज की मैगजीन में उनकी पहली कहानी छपी, जो उनकी कला के क्षेत्र में पहली एंट्री थी। अपने प्रिंसिपल से मिले इस मौके को उन्होंने कॅरियर का लक्ष्य बना लिया। इसी कारण वह पंजाब आने पर कॉलेज जरूर पहुंचते थे और यहां की मिट्टी को अपने माथे पर लगा लेते थे। वह दोआबा कॉलेज को हर साल एक लाख रुपये की सहायता देते थे।

यश चोपड़ा बेशक बॉलीवुड में आसमान की बुलंदियों को छू गए थे, लेकिन उनको असली प्रेराणा जालंधर स्थित दोआबा कॉलेज के कार्यकारी प्रिंसिपल से मिली थी। इसी प्रेरणा के चलते ही उनके गुण दोआबा कॉलेज में स्नातक के दौरान ही दिखने लगे थे। दोआबा कॉलेज जालंधर के प्रसिद्ध देवी तालाब मंदिर के सामने है। इसी कॉलेज में 1945 में यश चोपड़ा ने स्नातक की पढ़ाई की थी। उस समय कॉलेज के कार्यकारी प्रिंसिपल डीडी विबरा थे। प्रोफेसर विबरा अंग्रेजी विभाग के हेड ऑफ डिपार्टमेंट थे, लेकिन वह यश चोपड़ा के भीतर छिपे गुणों को परखने में माहिर थे और उन्हें प्रेरित करते थे।

बताते हैं कि प्रोफेसर विबरा ने उस समय कॉलेज की तरफ से दोआब मैगजीन शुरू की थी, जिसमें पहली कहानी यश चोपड़ा की छपी थी। यहीं से यश चोपड़ा की कला निखरनी शुरू हुई। दोआबा कॉलेज की मैगजीन से ही विख्यात होकर यश चोपड़ा सफलता की सीढ़ियां चढ़ते गए। इसीलिए अंतिम समय तक वह हर साल एक लाख रुपये दोआबा कॉलेज को भेजते थे।

कालेज में स्टूडियो बना जिसमें न्यूज रीडिंग, वीडियो शूट, आरजेइंग, एडिटिंग का काम शुरू हुआ। इस स्टूडियो के लिए सारा सामान खुद यश चोपड़ा ने तय किया और खुद ही खरीदा। उनकी मर्जी से स्टूडियो तैयार किया गया। आज भी दोआबा कॉलेज उनकी याद की कहानी को बयान करता है। यहां के प्रिंसिपल नरेश धीमान का कहना है कि आज भी दोआबा कॉलेज में जो भी प्रोडक्शन का काम हो रहा है, वह यश चोपड़ा के ही दिशा-निर्देश पर है। यश चोपड़ा से जब भी कॉलेज में नई चीज शुरू करने, कार्यक्रम में बुलाने की बात की गई, उन्होंने कभी इनकार नहीं किया।

स्टेशन पर बुला लिया प्रिंसिपल को
‘रब ने बना दी जोड़ी’ की रिलीज के बाद यशजी अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में मत्था टेकने के लिए आए थे। वापसी में उनकी शताब्दी एक्सप्रेस ट्रेन जालंधर में खड़ी हो गई। उन्होंने तुरंत ही दोआबा कॉलेज के तत्कालीन प्रिंसिपल आरपी भारद्वाज को फोन किया और स्टेशन पर ही कॉलेज के बारे में जानकारी ली और कुछ नया करने को कहा।,

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