कर्ज माफ कर पंजाब को बना लिया ऋणी

Jalandhar Updated Sat, 01 Dec 2012 12:00 PM IST
जालंधर। आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल ने एक झटके में पंजाब और शिरोमणि अकाली दल को अपना मुरीद बना लिया था। उन्होंने पीएम पद संभालते ही पंजाब के विकास को अपना केंद्र बिंदु बनाया था। अकाली दल की मांग पर गुजराल ने पंजाब के सिर पर चढ़ा 8500 करोड़ का कर्ज माफ कर दिया था। इस पर शिअद नेताओं ने भी गुजराल साहब को सिर आंखों पर बैठाया और उनके मुकाबले उम्मीदवार न खड़ा करने का ऐलान किया। इतना ही नहीं 2004 में उनके बेटे नरेश गुजराल को जालंधर से शिअद का टिकट दिया गया। बेशक नरेश गुजराल चुनाव नहीं जीत पाए लेकिन शिअद ने नरेश को पार्टी में अहमियत दी।
पंजाब में आतंकवाद के दौर में सूबे की जहां आर्थिक हालत खस्ता हो गई थी वहीं पैरा मिलिटरी फोर्स को ठहराने और सिक्योरिटी के खर्च से 8500 करोड़ रुपये का कर्ज चढ़ गया था। इसका ब्याज अदा करते-करते पंजाब की कमर टूट गई थी। उसी दौरान 1997 में गुजराल जालंधर में शहीद परिवार फंड समारोह में आतंकवाद पीड़ित परिवारों को सहायता देने के लिए एक कार्यक्रम में शिरकत करने आए थे। पंजाब के तत्कालीन सीएम प्रकाश सिंह बादल ने समारोह में मांग उठाई कि पंजाब में आतंकवाद सूबे की नहीं बल्कि पूरे देश की समस्या थी, इसलिए इसका कर्ज पंजाब क्यों वहन करे? समारोह खत्म हुआ तो गुजराल और बादल आपस में मिले। गुजराल ने बादल से कहा - आपका तर्क और सवाल बिलकुल वाजिब है। पंजाब अकेला आतंकवाद से निपटने का खर्च क्यों वहन करे। गुजराल ने दिल्ली पहुंचते ही पंजाब के सिर पर चढ़े कर्ज को माफ करने की प्रक्रिया शुरू कर दी। पंजाब के सिर से 8500 करोड़ का कर्ज माफ हो गया। इसके बाद शिअद ने जालंधर में एक बड़ी धन्यवाद रैली की जिसमें डा. मनमोहन सिंह से लेकर तमाम कांग्रेसी नेताओं ने भी शिरकत की।

अहसान माना भी :
शिअद ने कर्ज माफ करवाया तो गुजराल का पूरा अहसान भी माना। गुजराल ने जालंधर से लोकसभा चुनाव लड़ा। उनके लिए शिअद ने सीट खाली छोड़ दी और घोषणा की कि शिअद कोई उम्मीदवार खड़ा नहीं करेगा। शिअद ने अमल कर दिखाया और पूरा दमखम लगाकर गुजराल को जिताया। इसके बाद भी गुजराल और शिअद का चोली दामन का साथ रहा। 2004 में जालंधर लोकसभा सीट आईके गुजराल ने अपने बेटे नरेश गुजराल को दे दी और यहां से शिअद ने उनको पार्टी में शामिल कर टिकट दिया। दूसरी तरफ से कांग्रेस के राणा गुरजीत मैदान में आए और नरेश को हार का मुंह देखना पड़ा। 2009 में जालंधर लोकसभा सीट रिजर्व हो गई, जिस कारण हंसराज हंस को टिकट दिया गया लेकिन नरेश गुजराल को शिअद ने राज्यसभा में भेजकर गुजराल के प्रति अपना प्यार और आस्था बरकरार रखी।

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