सात घंटों में संजो लिए थे सात हजार सपने

Jalandhar Updated Thu, 28 Jun 2012 12:00 PM IST
जालंधर। जिंदगी के 22 साल का गम मंगलवार को उन सात घंटों ने भुला दिया, जिनमें सरबजीत का परिवार रिहाई की खुशियां मना रहा था। सात घंटों में ही परिवार ने सात हजार सपने संजो डाले थे। सरबजीत के परिवार को शायद यह पता नहीं था कि उनके संजोए सपने सात घंटों के भीतर ही टूट जाएंगे और फिर से वही दर्द शुरू हो जाएगा जो पिछले 22 साल से चल रहा है।
दलबीर कौर ने अपने भाई सरबजीत सिंह की रिहाई के लिए बड़ी मुहिम चलाई। इससे भारत सरकार भी जागी। मंगलवार को पाकिस्तान के पत्रकार खालिद महमूद ने सबसे पहले दलबीर कौर को खुशखबरी दी कि उनके भाई सरबजीत की रिहाई के आदेश हो गए हैं। दलबीर कौर को तो विश्वास ही नहीं हुआ। उन्होंने तीन बार बात करके पूछा तो खालिद ने बताया कि उसने पुष्टि कर ली है। बाकायदा जेल में भी सरबजीत को बता दिया गया है।
दलबीर कौर ने खुशी की यह खबर अपनी भतीजियों व भाभी सुखप्रीत कौर को भी दी। दलबीर कौर सपने संजोने लगीं कि सरबजीत के भारत आते ही अटारी बार्डर पर धूमधाम से उनका स्वागत किया जाएगा। फिर खुली जीप में भाई को घर तक लेकर जाया जाएगा। वे सबसे पहले अजमेर शरीफ माथा टेकने जाएंगे। कई लोगों ने मन्नतें मांगी हैं, सबकी मुराद पूरी हो गई हैं। हर धार्मिक स्थल पर जाएंगे। लेकिन उनकी यह खुशी आधी रात के बाद काफूर हो गई।

एक झटके से टूट गए सपने
सरबजीत 28 अगस्त 1990 को पाकिस्तान में गिरफ्तार हुआ था। पत्नी सुखप्रीत कौर बताती हैं कि उनको तो तभी पता चला कि सरबजीत पाकिस्तान में है। उन पर जासूसी का आरोप लगा है। उनकी बड़ी बेटी स्वप्नदीप उस समय ढाई साल की थी जबकि छोटी बेटी पूनम 23 दिन की। बेटियों को तो पिता का चेहरा भी याद नहीं। मंगलवार को जैसे ही रिहाई का संदेशा आया तो फटाफट टीवी आन किया। हर चैनल पर सरबजीत की रिहाई की खबरों की चरचा थी। सुखप्रीत कौर बताती हैं - खुशखबरी पाकर मैं 22 साल का संघर्ष भूल गई लेकिन रात को एक बजे के आसपास मेरे सारे सपनों के महल ध्वस्त हो गए। फोन की घंटी फिर बजने लगीं। जो पहले बधाइयां दे रहे थे, वही कह रहे थे कि सरबजीत नहीं रिहा होगा।

बेटी की उम्मीदें रह गईं अधूरी
बेटी स्वप्नदीप की शादी तीन साल पहले हो चुकी है। उसने बताया - सोचा था कि पिता के साथ बैठकर ढेर सारी बातें, सारे सुख दुख सांझा करूंगी। पूछूंगी, वे जेल में कैसे रहे, उनकी सेवा करूंगी। इच्छा थी कि उनको अपने पास जालंधर में ही रख लूं। कई तरह की योजनाएं बना रखी थी। मंगलवार शाम से ही टीवी से चिपकी रही। पिता की तसवीर देखती और रिहाई की खबर से खुशी हो रही थी। रात एक बजे दिल बैठने लगा। खबरें आने लगीं कि सरबजीत नहीं सुरजीत रिहा होंगे। 22 साल का वह संघर्ष फिर ताजा हो गया जिसे कुछ समय पहले भूल चुकी थी।

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