व्यक्तित्व की बदौलत बने थे सर्वोच्च नागरिक

Bathinda Updated Tue, 25 Dec 2012 05:30 AM IST
संधवां (फरीदकोट)। फरीदकोट रियासत के गांव संधवां में 5 मई 1916 को एक साधारण किसान परिवार के घर पैदा हुए ज्ञानी जैल सिंह ने अपने साफ सुथरे व्यक्तित्व की बदौलत देश का सर्वोच्च नागरिक होने का मान हासिल किया था। 25 दिसंबर मंगलवार को उनकी 18वीं बरसी पर उन्हें देश के प्रति सेवाओं के चलते नमन किया जाएगा।
धार्मिक वृत्ति वाले भाई किशन सिंह की चार संतानों में से सबसे छोटे ज्ञानी जैल सिंह की धर्म के प्रति अगाध आस्था थी। नौ माह की आयु में ही मां इंद्री कौर के निधन के कारण मां की बड़ी बहन दया कौर ने उनका लालन पोषण किया। उन दिनों स्वतंत्रता संग्राम पूरे यौवन पर था, जिसके चलते वह 15 वर्ष की आयु में स्वतंत्रता सेनानी बन गए। 1933 में अंग्रेजों के खिलाफ हुए रोष मार्च में भाग लेने पर उन्हें पहली बार जेल जाना पड़ा। उस समय उन्हें लाहौर की केंद्रीय जेल में बंद किया गया। 1938 में राष्ट्रीय स्तर पर पंडित जवाहर लाल नेहरू की अगुवाई में चल रहे स्वतंत्रता संग्राम से प्रभावित होकर उन्होंने फरीदकोट में कांग्रेस समिति का गठन किया और खुद रियासती प्रजा मंडल आंदोलन में शामिल हुए। इस आंदोलन को दबाने के लिए किए गए जुल्मों के आगे ज्ञानी जी कभी नहीं झुके। इसके चलते उन्हें पांच वर्ष की सजा सुनाई गई। 1946 में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ सत्याग्रह शुरू किया और यहां के हालातों के चलते 27 मई 1946 को पंडित जवाहर लाल नेहरू फरीदकोट पधारे। यहां पहुंचे पंडित जी भी ज्ञानी जी के व्यक्तित्व व जोश से काफी प्रभावित हुए। उस समय पंडित नेहरू ने ज्ञानी जी की अगुवाई में पुरानी दाना मंडी में तिरंगा फहरा कर स्वतंत्रता संग्राम को और तेज करने का ऐलान किया था।
आजादी के बाद राजनीति में कूदे
आजादी के बाद 1949 में बनी पेप्सू सरकार में ज्ञानी जी राजस्व मंत्री बने। दूसरी बार उन्हें सिंचाई व लोक निर्माण मंत्रालय सौंपे गए। एक अच्छे गुणों वाले नेता होने की बदौलत कांग्रेस ने 1955 में उन्हें पेप्सू कांग्रेस का प्रधान नामजद किया। 1956 से 1962 तक वे संसद के उच्च सदन राज्यसभा के सदस्य रहे। 1962 में पंजाब विधानसभा का सदस्य चुने जाने पर उन्हें राज्य मंत्री बनाया गया। 1966 में प्रदेश कांग्रेस के प्रधान बने और 1972 मेें पंजाब विधानसभा में पूर्ण बहुमत हासिल करके पंजाब के मुख्यमंत्री का कार्यभार संभाला। वह पूरे पांच वर्ष तक मुख्यमंत्री रहे। उनकी कोशिशों से ही गुरु गोबिंद सिंह ट्रस्ट की तरफ से फरीदाबाद में बनाए गए मेडिकल कालेज को फरीदकोट में तबदील किया गया। धर्म के प्रति गहरी आस्था के चलते उन्होंने श्री आनंदपुर साहिब से श्री दमदमा साहिब तक 640 किलोमीटर लंबे गुरु गोबिंद सिंह मार्ग का काम मुकम्मल करवाया। 1979 में लोकसभा सांसद बनने पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें केंद्रीय गृह मंत्री नियुक्त किया। उनके गुणों से इंदिरा गांधी भी खासी प्रभावित हुईं और वह 25 जुलाई 1982 को देश के 7वें राष्ट्रपति बने। 29 नवंबर 1994 को आनंदपुर साहिब से चंडीगढ़ जाते वक्त वे एक सड़क हादसे का शिकार हुए। इसके चलते 25 दिसंबर 1994 को पीजीआई चंडीगढ़ में उपचार के दौरान उनका निधन हो गया।
यादगार के रूप में पंचभुजी टावर
गांव संधवां में पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह की यादगार के रूप में एक पंचभुजी टावर बना है। इस टावर की ऊंचाई 78.7 फुट है जोकि उनके जीवन के 78 वर्ष सात माह व बीस दिन को दर्शाती है। टावर का पंचभुजी होना पंजाब के पांच दरियाओं का महत्व दर्शाता है। उनके जीवन के उतार-चढ़ाव को दिखाने के लिए टावर में दस त्रिकोण व तिरछे कटाव बनाए गए हैं। फाइबर ग्लास से तैयार टावर पर धौलपुर से लाया गया पत्थर लगाया गया है। इसकी दीवारों पर हिंदी, उर्दू, पंजाबी व अंग्रेजी में उनकी जीवनी उकेरी गई है। भीतरी भाग को प्लास्टर ऑफ पेरिस से सजाया गया है। इसका पूरा डिजाइन चंडीगढ़ की वास्तुकार नम्रता कलसी ने तैयार किया था। यहां पर ज्ञानी जी का कांस्य का बुत सुशोभित है। यहां पर राष्ट्रपति भवन से लाई गई उनकी एक कुर्सी भी रखी हुई है।

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