पूनम तोमर
मैं पूनम तोमर हूँ, एक राजपूत परिवार में जन्मी, जहाँ मुझे माँ-पापा का अपार स्नेह मिला। मेरे पापा इंजीनियर थे और मेरा बचपन सुख-सुविधाओं में बीता। हमारे समाज में बेटियों को लेकर कई धारणाएँ रही हैं, लेकिन मेरे माता-पिता ने मुझे हमेशा सम्मान और आत्मविश्वास दिया।
मेरी शादी एक इंजीनियर परिवार में हुई। ससुराल में भी हर सुविधा थी। जब मैं अपने पति के साथ उनके पोस्टिंग स्थल पर रहने लगी, तो धीरे-धीरे उनके तनाव को महसूस किया। बाद में पता चला कि उनकी नौकरी स्थायी नहीं थी। यह उनकी गलती नहीं थी; सरकारी निर्णय के कारण पूरे उत्तर प्रदेश में लगभग 600 इंजीनियर प्रभावित हुए।
15 वर्षों के संघर्ष के बाद जब नौकरी स्थायी हुई, तो लगा जैसे भगवान राम वनवास से लौट आए हों। हमने फिर सपने देखे—घर, गाड़ी, बच्चों की पढ़ाई—और वे पूरे भी हुए।
लेकिन जीवन ने फिर परीक्षा ली। एक दुर्घटना ने मेरे पति को चलने में असमर्थ कर दिया। इतने सक्रिय व्यक्ति को इस अवस्था में देखकर मैं अंदर से टूट गई। मेरी आवाज़ चली गई, आत्मबल डगमगा गया।
खुद को संभालने के लिए मैंने सीखना चुना—हीलिंग, पब्लिक स्पीकिंग और फिर लाइफ कोचिंग। समाज ने शक की नज़र से देखा, मंच नहीं मिले, लेकिन मेरे पास हार मानने का विकल्प नहीं था।
मैंने कभी भगवान से शिकायत नहीं की। सिर्फ़ शुक़राना किया—जो मैंने अपनी माँ से सीखा था। तभी मैंने तय किया कि अगर मेरा दर्द किसी के काम आ सके, तो यही मेरी जीत होगी। यहीं से “मेरी पहचान” अवॉर्ड और पॉडकास्ट की शुरुआत हुई—एक ऐसा मंच जहाँ हर कोई खुलकर अपनी कहानी सुना सकता है।
2025 में मुझे विश्व हिंदू महासंघ, ग़ाज़ियाबाद की ज़िला अध्यक्ष चुना गया। मैं इसे पद नहीं, बल्कि सेवा, नारी सशक्तिकरण और समाज के लिए कार्य करने का अवसर मानती हूँ