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कबीर वाणी
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कबीर वाणी: कथा कीर्तन कुल विशे, भव सागर की नाव

28 June 2022

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कथा कीर्तन कुल विशे, भव सागर की नाव । क़हत कबीरा या जगत, नाहीं और उपाय ।। कबीरदास जी कहते हैं कि संसार रूपी भवसागर से पार उतरने के लिए कथा-कीर्तन की नाव चाहिए इसके सिवाय पार उतरने के लिए और कोई उपाय नहीं ।

कबीर वाणी: कथा कीर्तन कुल विशे, भव सागर की नाव

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सभी 42 एपिसोड

सुमिरन से मन लाइये, जैसे कामी काम ।
एक पलक बिसरे नहीं, निश दिन आठौ याम ।।

कबीरदास जी कहते हैं कि जिस प्रकार कामी मनुष्य अपने काम में प्रवृत रहता है । अपनी प्रेमिका का ध्यान आठों पहर करता है उसी प्रकार हे प्राणी! तू अपने मन को भगवत स्मरण में लगा दे

गारी ही सों ऊपजे, कलह कष्ट और मींच ।
हारि चले सो साधु है, लागि चले सो नींच ॥

गाली से मरने मारने तक की बात आ जाती है, इससे अपनी हार मानकर जो विरक्त हो चलता है, वो सन्त है, और गाली गलौज एवं झगड़े में जो व्यक्ति मरता है, वो नीच है।
 

निंदक नियेरे राखिये, आंगन कुटी छावायें 
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुहाए 

कबीर दास जी कहते हैं कि निंदक हमेशा दूसरों की बुराइयां करने वाले लोगों को अपने पास रखतें हैं , क्योंकि ऐसे लोग अगर पास रहेंगे तो आपकी बुराइयां आपको बताते रहेंगे।  

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय ॥

हे मन ! धीरे-धीरे सब कुछ हो जाएगा। माली सैंकड़ों घड़े पानी पेड़ में देता है परंतु फल तो ऋतु के आने पर ही लगता है। अर्थात धैर्य रखने से और सही समय आने पर ही काम पूरे होते हैं।

जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होए ।
यह आपा तो डाल दे, दया करे सब कोए ।

इसका यह भावार्थ है कि आपका मन हमेशा शीतल होना चाहिए अगर आपका मन शीतल है तो इस दुनिया में आपका कोई भी दुश्मन नहीं बन सकता।

मलिन आवत देख के, कलियन कहे पुकार ।
फूले फूले चुन लिए, कलि हमारी बार ।

कबीरदास जी कहते हैं बगीचे में जब कलियां माली को आकर देखती है तब आपस में बातचीत करती है कि माली आज फूल को तोड़ कर ले कर गया फिर कल हमारी भी बारी आएगी।कबीर दास जी यह समझाना चाहते हैं कि आज आप जवान हैं तो कल आप  भी बुड्ढे हो जाओगे , और मिट्टी में भी मिल जाओगे।

पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,

ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

बड़ी-बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुंच गए, पर सभी विद्वान न हो सके। कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, तो वही सच्चा ज्ञानी होगा।

वृक्ष बोला पात से, सुन पत्ते मेरी बात ।
इस घर की ये रीति है, एक आवत एक जात ।।

वृक्ष पत्ते को उत्तर देता हुआ कहता है कि हे पत्ते, इस संसार में यही प्रथा प्रचलित है कि जिसने जन्म लिया है वह अवश्य मृत्यु को प्राप्त होता है ।

प्रेम न बारी उपजे, प्रेम न हाट बिकाए ।
राजा प्रजा जो ही रुचे, सिस दे ही ले जाए ।

 कबीर दास जी कहते हैं कि प्रेम कहीं खेतों में नहीं उगता और नाही प्रेम कहीं बाजार में बिकता है। जिसको प्रेम चाहिए उसे अपना शीशक्रोध, काम, इच्छा, भय त्यागना होगा।
 

जो टोकू कांटा बुवे, ताहि बोय तू फूल ।
तोकू फूल के फूल है, बाकू है त्रिशूल ॥

जो तेरे लिए कांटा बोय तू उसके लिए फूल बो, तुझे फूल के फूल मिलेंगे और जो तेरे लिए कांटा बोएगा उसे त्रिशूल के समान तेज चुभने वाले कांटे मिलेंगे 
 

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