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अमर अकबर एंथोनी
सुन सिनेमा

इस फिल्म ने अमिताभ बच्चन को दिलाया करियर का पहला फिल्मफेयर, सुनिए दिलचस्प बातें

10 January 2022

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4:38
अमर उजाला आवाज सुनने वालों को मेरा यानी आसिफ का प्यार भरा नमस्कार..हाजिर हो गया हूं आपका पसंदीदा शो सुन सिनेमा लेकर...दोस्तों आज बात होगी सुपरहिट फिल्म अमर अकबर एंथोनी की...27 मई 1977 को ‘अमर अकबर एंथोनी।’रिलीज हुई थी जिसे मनमोहन देसाई ने डायरेक्ट किया था। फिल्म अगर आज के समय में बनी होती तो शायद बेस्ट फिल्म फॉर नेशनल इंटीग्रेशन के लिए अवॉर्ड जीत जाती। लेकिन जिस दौर में आई थी तब भी खूब नाम कमाया। अमिताभ बच्चन को इसके लिए उनके करियर का पहला फिल्मफेयर और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी को बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर का अवॉर्ड मिला था। इसके साथ ही उस साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म भी बनी। इसके गाने और वन लाइनर्स ने इंडिया में मसाला फिल्मों के लिए एक नया ट्रेंड सेट कर दिया। इस फिल्म के बनने का प्रोसेस ऐसा था कि फिल्म पूरी भी हो गई लेकिन डायरेक्टर को पता ही नहीं चला। उनके बेटे ने बताया तब पता चला। ऐसे ही कुछ और भी मजेदार किस्से इस फिल्म की मेकिंग से जुड़े हैं जिन्हें सुनकर आपका दिन बन जाए। 

इस फिल्म ने अमिताभ बच्चन को दिलाया करियर का पहला फिल्मफेयर, सुनिए दिलचस्प बातें

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फिल्मों में आपने ये डायलॉग तो जरूर सुना होगा...भागने की कोशिश मत करना...हमने तुम्हें चारों तरफ से घेर लिया है...भलाई इसी में है कि तुम अपने आप को कानून के हवाले कर दो...कुछ याद आया...जी हां..हिंदी फिल्मों में लगभग हर पुलिसवाले की जुबान से ये सुनने को मिल ही जाता था...इस डायलॉग को सुनकर एक जो तस्वीर सामने उभरकर आती है वो हैं इफ्तिखार...सिने प्रेमी अभिनेता इफ्तिखार को पुराने जमाने की फिल्मों में पुलिसवाले की अनगिनत भूमिकाओं के लिए बखूबी जानते हैं...लेकिन क्या आप जानते हैं कि इफ्तिखार एक अच्छे कलाकार के साथ-साथ अच्छे गायक और पेंटर भी थे...हम आज इन्हीं की जिंदगी के बारे में बात करेंगे कि कैसे वो एक अच्छी खासी नौकरी छोड़कर मनोरंजन की दुनिया में आगे बढ़े...

दोस्तों आज हम जिनकी बात करने जा रहे हैं वो कपूर खानदान से ताल्लुक रखते हैं और अपने जमाने के मशहूर ओ मारूफ कलाकार रहे हैं...आज बात होगी शशि कपूर साहब की जिंदगी से जुड़े कुछ किस्सों की...शशि कपूर का जन्म 18 मार्च 1938 को कलकत्ता में हुआ था...पिता पृथ्वीराज कपूर थियेटर के मालिक थे तो अदाकारी विरासत में मिली थी...जब फिल्मों का दौर शुरू हुआ तो थियेटर में ताले पड़ने लगे..जिसकी वजह से शशि कपूर के पिता पृथ्वीराज कपूर को बंबई का रुख करना पड़ा...पिता और भाई मूक फिल्मों के जमाने से काम करने लगे...शशि कपूर थोड़े बड़े हुए तो उन्होंने भी बतौर बाल कलाकार फिल्मों में काम करना शुरू कर दिया...और शुरू हो गया फिल्मों में अदाकारी का सफर...

दोस्तों आज बात होगी 1997 में आई एक्शन ड्रामा फिल्म विरासत की जिसे निर्देशित किया था प्रियदर्शन ने और मुख्य भूमिकाओं में थे अनिल कपूर, तब्बू, अमरीश पुरी, पूजा बत्रा, मिलिंद गुनाजी और गोविंद नामदेव हैं। फिल्म की कहानी मशहूर अभिनेता कमल हासन ने लिखी गई थी और तमिल फिल्म थेवर मगन की सफलता के बाद इसे हिंदी में विरासत के नाम से दोबारा बनाया गया। मुशीर-रियाज की जोड़ी ने फिल्म को प्रोड्यूस किया था और संगीत अनु मलिक और एस पी वेंकटेश ने तैयार किया गया था....फिल्म विरासत से हिंदी सिनेमा में निर्देशक प्रियदर्शन ने वापसी की थी...इस फिल्म को तब्बू की बेहतरीन अदाकारी के लिए भी जाना जाता है...तो चलिए सुनाते हैं फिल्म विरासत से जुड़ीं कुछ दिलचस्प बातें....
 

आज हम बात करेंगे फिल्म गाइड की...गाइड हिंदी फिल्मों की मास्टरपीस तो मानी ही जाती है साथ ही इसके अंग्रेजी संस्करण ने कान्स में भी जलवा बिखेरा वो भी अपनी रिलीज के 42 साल बाद 2007 में... हालांकि इसका अंग्रेजी संस्करण अपने रिलीज के वक्त फ्लॉप रहा था जबकि डायरेक्टर टैड डेनियलवस्की ने इस फिल्म में वहीदा रहमान का एक न्यूड सीन भी रखा था जिसे बॉडी डबल पर फिल्माया गया था...देव आनंद और वहीदा रहमान की जोड़ी से सजी इस फिल्म ने गीत-संगीत, डायलॉग, एक्टिंग हर तरह से इतिहास रच दिया....

दोस्तों आज बात होगी उस अभिनेत्री की जिसके दीवाने अमेरिकी सैनिक भी थी...अपनी जेब में फोटो लेकर जंग लड़ते थे...वो न तो वो मधुबाला हैं और न ही नरगिस...और न ही सुरैया...इस अभिनेत्री का नाम है बेगम पारा...जी हां...आज की पीढ़ी ने शायद बेगम पारा का नाम ना सुना हो लेकिन एक्ट्रेस बेगम पारा ने 40 से 50 के दशक में बोल्ड फोटोशूट करवाकर हिंदी सिनेमा में भूचाल ला दिया था। हर तरफ बेगम पारा के चर्चे थे। बेगम पारा दिलीप कुमार की भाभी और अभिनेता अय्यूब खान की मां थीं...

फिल्म में खलनायक की भूमिका के लिए विजय आनंद ऐसे कलाकार को चाहते थे जिसे दर्शकों ने कभी नकारात्मक किरदार में न देखा हो..क्योंकि कहानी की मांग भी वही थी. इसलिए विजय आनंद ने अशोक कुमार को इस किरदार के लिए चुना....

दोस्तों आज बात होगी उनकी,जिन्हें हिंदी फिल्मों का पहला सुपरस्टार कहा जाता है...जी हां हम बात कर रहे हैं अशोक कुमार की...क्या आप जानते हैं कि अशोक कुमार को कैसे किस्मत ने अभिनेता बता दिया था...वक्त जाया न करते हुए करते हैं कहानी की शुरुआत...अशोक कुमार का असली नाम कुमुदलाल गांगुली था....40 और 50 के दशक में हीरो बनकर, फिर चरित्र किरदार कर अशोक कुमार ने दशकों तक हिंदी सिनेमा पर राज किया...अशोक कुमार एक बेहतरीन अभिनेता होने के साथ-साथ एक अच्छे पेंटर थे...साथ ही वो होम्योपैथी की प्रैक्टिस भी किया करते थे...उनका अभिनेता बनने का कोई इरादा नहीं था और बॉम्बे टॉकीज में लैब असिस्टेंट की नौकरी कर रहे थे...वो कहते हैं न कि अगले पल आपकी जिंदगी में क्या होने वाला है वो किसी को नहीं पता होता है...उनके फिल्मों में आने की कहानी शुरू हुई 1935 में आई फिल्म जवानी की हवा से...

दोस्तों आज की कहानी है हिंदी सिनेमा के जुबली कुमार राजेंद्र कुमार की...अपनी रोमांटिक अदाओं से दर्शकों का दिल जीत लेने वाले राजेंद्र कुमार भले ही आज हमारे बीच न हों लेकिन उनका गाना हर शादी की शान बन गया है...बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है ऐसा गाना बन गया है जिसके बगैर हर बरात अधूरी है...खैर आज हम बात करेंगे कि कैसे राजेंद्र कुमार फिल्मों में आए और क्यों उन्हें सस्ता दिलीप कुमार कहा जाता था...साथ ही ये भी बताएंगे कि किस फिल्म के बाद लोग उन्हें मुसलमान समझने लगे थे...शुरुआत उनकी जिंदगी से...

आपने सदाबहार अभिनेता और अभिनेत्रियों के बारे में तो सुना होगा लेकिन हम आज बात करेंगे सदाबहार खलनायक की..एक ऐसा खलनायक जिसने परदे पर सबसे ज्यादा बार नारद मुनि का किरदार निभाया...जिसकी संवाद अदायगी से ही एक अलग तरह की मक्कारी झलकती थी...जी हां, हम बात कर रहे हैं हिंदी सिनेमा के मशहूर खलनायकों में शुमार रहे जीवन की...छरहरी काया, लंबे कद और डायलॉग बोलने के अपने खास अंदाज से जीवन ने हिंदी सिनेमा में ऐसी छाप छोड़ी कि नई पीढ़ी के कलाकार उनकी नकल करते नजर आते हैं...उनकी जुबान से निकलने वाले डायलॉग उनके चेहरे के हावभाव से होकर जब गुजरते थे तो देखने वाले सिर्फ नफरत की नजर से देखते थे...और यही वो कलाकारी थी जो उनके अभिनय की एक अलग पहचान बन गई।

दोस्तों आज बात होगी अपने जमाने के मशहूर खलनायक मदन पुरी की...उनकी नकारात्मक भूमिकाओं ने ही उन्हें पर्दे पर ज्यादा पहचान दिलाई...वो भारी भरकम शरीर के मालिक तो नहीं थे, लेकिन जो चीज उन्हें सबसे अलग बनाती थी, वो थी उनकी अनोखी डायलॉग डिलीवरी...उनकी कुटिल मुस्कान और धूर्त नज़र बताती थी कि उनके मन में कुछ गलत चल रहा है...फिल्मी करियर में उन्होंने करीब 450 फिल्मों में काम किया..किसी में खलनायक बने तो किसी में बड़े भाई....किसी में पिता तो किसी में साइंटिस्ट...चलिए उनकी कहानी का सिलसिला शुरू करते हैं उनकी पैदाइश से...

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